‘जबरन नहीं ढोया जा सकता शादी का रिश्ता’, तलाक पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

एमपी न्यूज। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने पति को क्रूरता के आधार पर दिया गया तलाक सही ठहराते हुए पत्नी की अपील खारिज कर दी। अदालत ने आदेश दिया कि पति दो महीने के भीतर पत्नी को 15 लाख रुपये एकमुश्त गुजारा भत्ता देगा। यह फैसला न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति अनिल वर्मा की खंडपीठ ने सुनाया।

आठ साल से अलग रह रहे थे दंपति

दोनों की शादी 18 मई 2013 को हुई थी। उनका एक बेटा है, जो मां के साथ रह रहा है। शादी के कुछ समय बाद ही विवाद शुरू हो गया और पत्नी अधिकतर समय मायके में रहने लगी।

पति का आरोप था कि पत्नी बड़े शहर में रहने का दबाव बनाती थी और झूठे मामलों में फंसाने की धमकी देती थी। वर्ष 2014 में पत्नी कथित रूप से गहने लेकर मायके चली गई और वापस नहीं लौटी। बाद में उसने पति और उसके परिवार के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज कराया। कोर्ट रिकॉर्ड के अनुसार, पति पहले ही शिकायत दर्ज करा चुका था, जिससे दहेज का मामला संदिग्ध पाया गया।

मानसिक प्रताड़ना माना

हाई कोर्ट ने कहा कि बिना उचित कारण लंबे समय तक अलग रहना और बार-बार आपराधिक मामले दर्ज कराना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।

अदालत ने टिप्पणी की कि जब पति-पत्नी के बीच भरोसा और साथ पूरी तरह खत्म हो जाए, तो जबरन रिश्ते को बनाए रखना उचित नहीं है। ट्रायल कोर्ट का तलाक का फैसला सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी गई।

अपहरण, दुष्कर्म व पाक्सो एक्ट का मामला निरस्त

इसी खंडपीठ ने एक अन्य मामले में श्याम उर्फ कल्लू डांगी के खिलाफ दर्ज अपहरण, दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट से जुड़े प्रकरण को समाप्त कर दिया।

न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फडके ने आदेश पारित करते हुए कहा कि दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से समझौता हो चुका है। पीड़िता अब बालिग है और उसने बयान में स्पष्ट किया कि उसने अपनी मर्जी से विवाह किया है और वर्तमान में आरोपित के साथ पति-पत्नी के रूप में रह रही है।

हाई कोर्ट के निर्देश पर प्रिंसिपल रजिस्ट्रार ने दोनों पक्षों के बयान दर्ज किए और रिपोर्ट में पुष्टि की कि समझौता स्वेच्छा से हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि निजी प्रकृति के विवादों में, यदि पक्षकार आपसी सहमति से समझौता कर लें, तो न्यायहित में आपराधिक कार्यवाही समाप्त की जा सकती है।

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