दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी महिला के कपड़ों की पसंद को आधार बनाकर उसके चरित्र पर सवाल उठाना या जिरह के दौरान उसके खिलाफ आरोप लगाना स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की गरिमा और अधिकारों का मूल्यांकन उसके पहनावे से नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा ने वर्ष 2013 में एक युवती के साथ यौन उत्पीड़न (Sexual harassment) के मामले में एक आरोपी को दोषी ठहराते हुए यह टिप्पणी की।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि समाज को महिलाओं और लड़कियों के कपड़ों को नियंत्रित करने की सोच से आगे बढ़ना होगा। इसके बजाय माता-पिता और समाज की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को दूसरों की व्यक्तिगत सीमाओं (पर्सनल बाउंड्री) का सम्मान करना, अपने व्यवहार पर नियंत्रण रखना और हर व्यक्ति के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना सिखाएं। किसी महिला के पहनावे को उसकी सहमति, चरित्र या व्यवहार का पैमाना नहीं माना जा सकता। अदालत के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामलों में इस तरह की दलीलें न केवल अनुचित हैं बल्कि पीड़िता को दोषी ठहराने वाली मानसिकता को भी बढ़ावा देती हैं।
मामले में पीड़िता ने आरोप लगाया था कि उसका पड़ोसी उसका पीछा करता था, उस पर अश्लील टिप्पणियां करता था और कई बार उसे गलत तरीके से छूता था। ट्रायल के दौरान आरोपी पक्ष के वकील ने जिरह में पीड़िता के पहनावे और निजी जीवन से जुड़े सवाल उठाए थे। न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा ने अपने फैसले में कहा कि बचाव पक्ष की जिरह और दलीलों में पीड़िता के चरित्र पर हमला करने का प्रयास किया गया। अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर आपत्ति जताई कि पीड़िता से उसके कथित ‘वेस्टर्न’ कपड़ों, उसके इलाके के लोगों के धर्म तथा उसके पहनावे को लेकर स्थानीय लोगों की आपत्तियों से जुड़े सवाल पूछे गए।
‘महिला क्या पहनती है, यह उसकी व्यक्तिगत पसंद’
दिल्ली हाई कोर्ट ने महिलाओं की स्वतंत्रता और गरिमा को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि कोई लड़की या महिला क्या पहनती है, यह पूरी तरह उसकी व्यक्तिगत पसंद का विषय है। इस पर न पड़ोसियों का अधिकार है, न समाज का, न किसी आरोपी का और न ही अदालत में पेश होने वाले वकीलों का। न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा ने यौन उत्पीड़न के एक मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी महिला के पहनावे को लेकर टिप्पणी करना या उसे उसके साथ हुए अपराध से जोड़ना न केवल गलत है, बल्कि एक चिंताजनक सामाजिक मानसिकता को भी दर्शाता है।
अदालत ने कहा कि यह धारणा कि जींस या पश्चिमी परिधान पहनने वाली महिलाएं युवाओं को “बिगाड़” सकती हैं, एक बेहद परेशान करने वाली और भ्रामक सोच है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिलाओं के कपड़ों को समस्या के रूप में देखना समाधान नहीं है। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि समाज और अभिभावकों की जिम्मेदारी लड़कियों और महिलाओं के पहनावे को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि बच्चों को जिम्मेदार व्यवहार, आत्मसंयम और दूसरों की व्यक्तिगत सीमाओं का सम्मान करना सिखाना है। अदालत ने कहा कि हर व्यक्ति को घर और बाहर दोनों जगह दूसरों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना सीखना चाहिए।
दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि महिलाओं के पहनावे को लेकर बनी पुरानी सामाजिक धारणाओं पर आधारित सवालों की न्यायिक प्रक्रिया में कोई जगह नहीं है। अदालत ने कहा कि ऐसे सवालों को किसी महिला के चरित्र हनन या उस पर दोषारोपण का माध्यम नहीं बनने दिया जा सकता। यौन उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में अपने करीब 50 पन्नों के फैसले में न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा ने कहा कि किसी लड़की या महिला का पहनावा उसकी व्यक्तिगत पसंद का विषय है। इस पर न पड़ोसियों, न समाज, न आरोपी और न ही अदालत में पेश होने वाले किसी वकील का कोई अधिकार है। अदालत ने कहा कि यह तर्क देना कि जींस या आधुनिक परिधान पहनने वाली महिलाएं युवाओं को “बिगाड़” सकती हैं, एक चिंताजनक और गलत सोच को दर्शाता है। ऐसी धारणाएं महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह को बढ़ावा देती हैं और उन्हें अनुचित रूप से दोषी ठहराने का प्रयास करती हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट की यह टिप्पणी वर्ष 2013 में एक किशोरी के साथ कथित यौन उत्पीड़न के मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई। अदालत ने इस मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती देने वाली दिल्ली पुलिस की अपील पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। मामले के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने वर्ष 2014 में ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। ट्रायल कोर्ट ने अगस्त 2014 में आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354A और POCSO Act की धारा 10 के तहत आरोपों से मुक्त कर दिया था।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला जुलाई 2013 की एक घटना से जुड़ा था। आरोप था कि आरोपी, जो पीड़िता का पड़ोसी था, ने 17 वर्षीय लड़की पर अश्लील टिप्पणियां की थीं और उसके गाल तथा शरीर के अन्य हिस्सों को अनुचित तरीके से छूकर गंभीर यौन उत्पीड़न किया था। सुनवाई के दौरान आरोपी ने अपना बचाव करते हुए दावा किया कि इलाके के कुछ लोगों ने लड़की के पहनावे पर आपत्ति जताई थी। आरोपी का कहना था कि स्थानीय लोगों ने लड़की के कपड़ों को लेकर पुलिस में शिकायत भी की थी, जिस शिकायत पर उसने हस्ताक्षर किए थे। आरोपी ने यह भी आरोप लगाया कि उस शिकायत की जानकारी मिलने के बाद किशोरी ने एक पुलिस उपनिरीक्षक की मदद से उसे झूठे मामले में फंसा दिया। आरोपी का दावा था कि लड़की और संबंधित पुलिस अधिकारी के बीच व्यक्तिगत संबंध थे और इसी कारण उसके खिलाफ कार्रवाई की गई।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा ने अपने फैसले में कहा कि मामले के रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि आरोपी और कुछ स्थानीय लोगों की मुख्य आपत्ति पीड़िता के कपड़ों को लेकर थी। अदालत ने यह भी नोट किया कि बचाव पक्ष की जिरह और दलीलों में बार-बार इस बात पर जोर दिया गया कि संबंधित क्षेत्र के लोग कथित रूप से रूढ़िवादी (ऑर्थोडॉक्स) थे और उन्होंने किशोरी के पश्चिमी (वेस्टर्न) परिधान पहनने पर आपत्ति जताई थी। कोर्ट ने बताया कि बचाव पक्ष के वकील ने पीड़िता से यह तक पूछा कि डॉक्टर के पास जाते समय उसने क्या पहन रखा था और यह भी कहा कि वह सामान्य रूप से “वेस्टर्न टाइट कपड़े” पहनती थी। अदालत ने इन सवालों को मामले के मूल तथ्यों से असंबंधित बताया।
अपने फैसले में हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे प्रश्न पूरी तरह से गैर-जरूरी और अनुचित थे। अदालत के अनुसार, इनका उद्देश्य घटना की सच्चाई जानना नहीं, बल्कि पीड़िता को उसके कपड़ों के आधार पर शर्मिंदा करना, उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाना और नैतिक रूप से उसे कठघरे में खड़ा करना था। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि ट्रायल कोर्ट को शुरुआती स्तर पर ही ऐसे सवालों की अनुमति नहीं देनी चाहिए थी। न्यायालय ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य तथ्यों की निष्पक्ष जांच करना है, न कि पीड़िता के पहनावे या व्यक्तिगत पसंद को आधार बनाकर उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाना।
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि अदालत में जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) का उद्देश्य तथ्यों को सामने लाना होता है, न कि किसी गवाह को डराना, अपमानित करना या शर्मिंदा करना। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि जिरह आवश्यक और उचित सीमाओं से बाहर चली जाती है, तो न्यायालय को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। जब भी किसी गवाह से ऐसे सवाल पूछे जाएं जिनका उद्देश्य उसे परेशान करना, बेइज्जत करना या मानसिक रूप से दबाव में लाना हो, तब अदालत का दायित्व है कि वह तत्काल और दृढ़ता से हस्तक्षेप करे।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में पीड़िता के धर्म, पहनावे और स्थानीय सामाजिक मान्यताओं को बार-बार मुद्दा बनाया गया, जबकि इनका आरोपित अपराध से कोई सीधा संबंध नहीं था। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मामले में धर्म को शामिल करने का “कोई कारण नहीं” था। फैसले में न्यायालय ने जोर देकर कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC), POCSO Act और अन्य सभी कानून हर नागरिक पर समान रूप से लागू होते हैं, चाहे उसका धर्म, समुदाय या सामाजिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो। हाई कोर्ट ने कहा कि न तो धर्म और न ही स्थानीय रीति-रिवाजों का इस्तेमाल किसी गैरकानूनी कृत्य को उचित ठहराने या किसी महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए किया जा सकता है। अदालत के अनुसार, किसी महिला के पहनावे या उसके धर्म को अपराध के मामले में घसीटना पूरी तरह अप्रासंगिक और अनुचित था।
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि न्यायिक अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करना ही नहीं, बल्कि यह भी है कि अदालत की कार्यवाही पीड़ितों और गवाहों के लिए दोबारा मानसिक आघात (री-ट्रॉमेटाइजेशन) का कारण न बने। अदालत ने कहा कि न्यायालयों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिरह की प्रक्रिया तथ्यों की पड़ताल तक सीमित रहे और उसे किसी गवाह या पीड़ित को अपमानित करने, शर्मिंदा करने या उसके चरित्र पर हमला करने के साधन के रूप में इस्तेमाल न किया जाए। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि निष्पक्ष सुनवाई (फेयर ट्रायल) का अधिकार भारतीय न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है और इसकी पूरी तरह रक्षा की जानी चाहिए। हालांकि, इस अधिकार का उपयोग किसी गवाह की गरिमा को ठेस पहुंचाने या उसके चरित्र हनन के लिए नहीं किया जा सकता।

