विदेशी MBBS डॉक्टरों को हाईकोर्ट से झटका! सिम्स में जमा 1 लाख फीस नहीं होगी वापस

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विदेश से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी कर बिलासपुर के छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) में इंटर्नशिप करने वाले विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट डॉक्टरों को बड़ा झटका दिया है। हाईकोर्ट ने इंटर्नशिप के दौरान जमा की गई एक लाख रुपये की फीस वापस करने और भारतीय मेडिकल कॉलेजों के छात्रों के समान पुराने स्टाइपेंड का भुगतान करने की मांग वाली तीन अलग-अलग याचिकाएं खारिज कर दी हैं। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने अपनी विदेशी मेडिकल डिग्रियां 18 नवंबर 2021 से पहले हासिल की थीं। ऐसे में वे राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) के 2021 में लागू हुए नए नियमों के आधार पर पिछली अवधि के लिए ये लाभ नहीं मांग सकते। इस मामले में मुख्य याचिका डॉ. श्यामू कुमार जांगड़े और 13 अन्य डॉक्टरों ने दायर की थी। इनके अलावा डॉ. छत्रेश चौधरी और डॉ. प्रणव पांडेय ने भी अलग-अलग याचिकाएं लगाई थीं। तीनों मामलों में समान कानूनी और तथ्यात्मक प्रश्न होने के कारण हाईकोर्ट ने इनकी एक साथ सुनवाई की।

याचिकाकर्ता डॉक्टरों ने विदेश से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद सिम्स बिलासपुर में अनिवार्य इंटर्नशिप की थी। डॉक्टरों का कहना था कि संस्थान में इंटर्नशिप के लिए उनसे एक-एक लाख रुपये फीस जमा कराई गई थी। इसके अलावा उन्हें भारतीय मेडिकल कॉलेजों से पढ़ाई करने वाले डॉक्टरों के बराबर स्टाइपेंड और दूसरी सुविधाएं भी नहीं दी गईं। डॉक्टरों ने अपनी मांग के समर्थन में राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग के 4 मार्च 2022 के दिशा-निर्देश और 19 मई 2022 के परिपत्र का हवाला दिया था। उनका कहना था कि इन निर्देशों के मुताबिक 18 नवंबर 2021 से पहले विदेश से मेडिकल डिग्री हासिल करने वाले विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट्स से इंटर्नशिप के लिए फीस नहीं ली जानी चाहिए। साथ ही उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रशिक्षण लेने वाले भारतीय मेडिकल ग्रेजुएट्स के समान स्टाइपेंड और सुविधाएं मिलनी चाहिए। NMC के 19 मई 2022 के आधिकारिक परिपत्र में भी विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट्स से इंटर्नशिप के लिए फीस नहीं लेने और भारतीय मेडिकल ग्रेजुएट्स के समान स्टाइपेंड देने संबंधी निर्देशों का उल्लेख किया गया था।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, चिकित्सा शिक्षा संचालनालय ने 5 अगस्त 2022 को इस संबंध में आदेश जारी किया था। इसके बाद डॉक्टरों को अगस्त 2022 से स्टाइपेंड मिलना शुरू हो गया, लेकिन इंटर्नशिप में पंजीयन की तारीख से अगस्त 2022 तक की अवधि का भुगतान नहीं किया गया। डॉक्टरों ने इसी अंतर को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनकी मांग थी कि उन्हें इंटर्नशिप की शुरुआत से ही स्टाइपेंड दिया जाए और पहले जमा कराई गई एक लाख रुपये की फीस भी वापस की जाए।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने फीस वापसी की मांग का विरोध किया। सरकार की ओर से बताया गया कि संबंधित डॉक्टरों ने इंटर्नशिप फीस वर्ष 2015 में ही जमा कर दी थी। वहीं, 24 नवंबर 2022 को हुई बैठक में निर्णय लिया गया था कि 4 मार्च 2022 के NMC परिपत्र जारी होने से पहले जिन छात्रों से इंटर्नशिप फीस ली जा चुकी है, उनकी रकम वापस नहीं की जाएगी। राज्य सरकार का तर्क था कि बाद में जारी दिशा-निर्देशों के आधार पर पहले जमा कराई गई फीस की वापसी का दावा नहीं किया जा सकता। सरकार ने अदालत के सामने अपने फैसले और संबंधित दस्तावेजों को भी प्रस्तुत किया।

मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि सभी याचिकाकर्ताओं ने अपनी विदेशी मेडिकल डिग्रियां 18 नवंबर 2021 से पहले हासिल की थीं। राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग के कंपल्सरी रोटेटिंग मेडिकल इंटर्नशिप रेगुलेशंस, 2021 इसी तारीख से प्रभावी हुए थे। अदालत ने फीस वापसी के मामले में राज्य सरकार के 24 नवंबर 2022 के निर्णय को रिकॉर्ड पर लिया। वहीं पुराने स्टाइपेंड के बकाये को लेकर याचिकाकर्ता ऐसा कोई अन्य लागू प्रावधान या विशेष निर्देश प्रस्तुत नहीं कर सके, जिसके आधार पर अगस्त 2022 से पहले की अवधि का भुगतान कराया जा सके। इन्हीं आधारों पर जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने तीनों याचिकाओं को खारिज कर दिया। इस फैसले के बाद याचिकाकर्ता डॉक्टरों को न तो पहले जमा कराई गई एक लाख रुपये की फीस की वापसी मिली और न ही अगस्त 2022 से पहले की अवधि के स्टाइपेंड के भुगतान की मांग स्वीकार हुई।

मुख्य याचिका डॉ. श्यामू कुमार जांगड़े और 13 अन्य डॉक्टरों ने दायर की थी। इनमें शामिल थे, डॉ. अरविंद कुमार लकड़ा, डॉ. राहुल कुमार और मोनिया जायसवाल। सोनिया जायसवाल, अदिति गुप्ता और दिव्या चंद्रा।- दीक्षा कौशिक, मनीषा चंद्रा और रितिका मसीह। रिचा, नवल चौधरी, कुशल किशोर पटेल और कान्हा श्रीवास। इसके अलावा डॉ. छत्रेश चौधरी और डॉ. प्रणव पांडेय ने भी अलग-अलग याचिकाएं लगाई थीं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता विकास श्रीवास्तव और राज्य सरकार की ओर से पैनल अधिवक्ता आकांक्षा वर्मा ने पक्ष रखा। इस फैसले से साफ हुआ कि इंटर्नशिप फीस और स्टाइपेंड से जुड़े मामलों में NMC के नियमों की प्रभावी होने की तारीख और राज्य सरकार के संबंधित निर्णय महत्वपूर्ण हैं। विदेशी मेडिकल डिग्रीधारक डॉक्टरों की फीस वापसी और पुराने स्टाइपेंड का विवाद फिलहाल हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के साथ समाप्त हुआ है।

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