डिजिटल डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में भारत में पहली बार इच्छामृत्यु (Euthanasia) की अनुमति प्रदान की है। शीर्ष अदालत का यह आदेश हरीश राणा नामक व्यक्ति के मामले में आया है, जिनके परिवार ने उनके गरिमापूर्ण अंत के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। गौरतलब है कि इसी मामले में दो साल पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया था।
दिल्ली हाई कोर्ट ने क्यों ठुकराई थी मांग?
हरीश राणा के परिवार ने दिल्ली हाई कोर्ट में अर्जी दाखिल कर एक मेडिकल बोर्ड गठित करने की मांग की थी। उनकी दलील थी कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘कॉमन कॉज बनाम केंद्र सरकार’ मामले में तय दिशा-निर्देशों के आधार पर हरीश का जीवन रक्षक उपचार बंद कर दिया जाए।
हालांकि, हाई कोर्ट ने इस मांग को अस्वीकार करते हुए कहा था कि हरीश राणा किसी यांत्रिक जीवन रक्षक प्रणाली (Ventilator) पर नहीं हैं और वे बाहरी सहायता के बिना सांस लेने और जीवित रहने में सक्षम हैं। अदालत का तर्क था कि चूंकि मरीज लाइलाज बीमारी के उस चरण में नहीं है जहां मौत निश्चित हो, इसलिए इच्छामृत्यु का प्रश्न ही नहीं उठता।
सुप्रीम कोर्ट में शेक्सपियर और हेनरी का जिक्र
हाई कोर्ट के इसी फैसले को 2024 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। मामले की गंभीरता और मानवीय संवेदनाओं को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साहित्य और दर्शन का सहारा लिया। फैसले के दौरान अदालत ने प्रसिद्ध साहित्यकारों को उद्धृत करते हुए कहा:
“भगवान किसी भी इंसान से यह नहीं पूछता कि क्या उसे जीवन स्वीकार है; आपको इसे स्वीकार करना ही पड़ता है।”
अदालत ने हेनरी के इन शब्दों के साथ शेक्सपियर की कालजयी पंक्तियों “To be, or not to be” (जीना या मरना) का भी जिक्र किया। शीर्ष अदालत ने माना कि जब जीवन केवल पीड़ा बन जाए, तो वहां मानवीय गरिमा के साथ अंत का विकल्प विचारणीय हो जाता है।
ऐतिहासिक बदलाव की ओर कदम
सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के परिवार की याचिका को स्वीकार करते हुए मेडिकल बोर्ड के गठन और इच्छामृत्यु की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी है। यह फैसला आने वाले समय में ‘राइट टू डाई विथ डिग्निटी’ (गरिमा के साथ मरने का अधिकार) की कानूनी व्याख्या में मील का पत्थर साबित होगा।

