रायपुर। चर्चित राम अवतार जग्गी हत्याकांड में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को हत्या और आपराधिक षड्यंत्र का दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। हाईकोर्ट के फैसले पर दिवंगत नेता रामावतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। सतीश ने कह है कि, वो कोर्ट से अमित जोगी को फांसी देने की गुजारिश करेंगे साथ ही पासपोर्ट जप्त करने का भी अनुरोध करेंगे। सतीश जग्गी ने कहा कि सुनवाई के दौरान मुझे कई बार धमकाया चमकाया गया , मेरी बहन की शादी में अड़चन पैदा करने की कोशिश की गई। आज के फैसले पर सतीश जग्गी ने कहा कि, हमारे पूरे परिवार को न्यायपालिका पर भरोसा था न्यायपालिका की जीत हुई।

उन्होंने कहा कि इन 23 वर्षों में हमें राजनीतिक शक्तियों के साथ मनी पॉवर से भी लड़ना पड़ा।
2003 में हुई थी एनसीपी नेता रामावतार जग्गी की हत्या
4 जून 2003 को एनसीपी नेता रामावतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में 31 अभियुक्त बनाए गए थे, जिनमें से बल्टू पाठक और सुरेंद्र सिंह सरकारी गवाह बन गए थे। अमित जोगी को छोड़कर बाकी 28 लोगों को सजा मिली थी। हालांकि 31 मई 2007 को रायपुर की विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव में अमित जोगी को बरी कर दिया था। रामअवतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने अमित जोगी को बरी करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, जिस पर अमित के पक्ष में स्टे लगा था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने केस को हाईकोर्ट भेज दिया।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए सुनाई सजा
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने सीबीआई की अपील (ACQA No. 66/2026) को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के 2007 के फैसले को पलट दिया। हाईकोर्ट ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) और धारा 120-बी (अपराधिक षड्यंत्र) के तहत दोषी ठहराया है। कोर्ट ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। साथ ही 1,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है। जुर्माना अदा नहीं करने की स्थिति में छह माह की अतिरिक्त सश्रम कारावास की सजा का प्रावधान किया गया है।
हाईकोर्ट का यह फैसला 31 मई 2007 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह पलट दिया है। उस समय स्पेशल जज (एट्रोसिटी) रायपुर ने अमित जोगी को बरी कर दिया था, जबकि चिमन सिंह, याह्या ढेबर, अभय गोयल और फिरोज सिद्दीकी सहित अन्य 28 आरोपियों को सजा सुनाई गई थी।
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि “एक ही गवाही के आधार पर कुछ आरोपियों को दोषी ठहराया जाना और मुख्य साजिशकर्ता को बरी कर दिया जाना कानूनी रूप से असंगत और गलत है।” बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मामला रीओपन किया गया था, जिसके बाद हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई हुई थी।
कौन थे रामवतार जग्गी?
छत्तीसगढ़ निर्माण के बाद प्रदेश की सियासत दो दलों के बीच घूमने लगी थी। इनमें पहला था अजीत जोगी की अगुवाई वाली कांग्रेस जबकि दूसरी एनसीपी यानी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी। राकांपा के मुखिया थे केंद्र में मंत्री रह चुके विद्याचरण शुक्ल। रामवतार जग्गी विद्याचरण शुक्ल के बेहद खास थे। सियासी संबंधों के साथ ही शुक्ल और जग्गी के बीच पारिवारिक रिश्ता भी था।
यह रामवतार जग्गी का अपने नेता विद्याचरण शुक्ल के प्रति समर्पण ही था कि, शुक्ल के कांग्रेस छोड़ने और नई पार्टी बनाने के दौरान जग्गी उनके साथ रहें। इन्ही वजहों से विद्याचरण शुक्ल ने रामावतार जग्गी को पार्टी का कोषाध्यक्ष भी नियुक्त कर दिया था। (Chhattisgarh Jaggi Murder Case) अपनी राजनीतिक सक्रियता और प्रभाव के चलते वे क्षेत्र में एक अहम चेहरा बन गए थे। संभवतः इन्ही वजहों से उनके खिलाफ राजनीतिक कटुता बढ़ती गई और उन्हें अपनी सक्रियता की कीमत जान गंवाकर चुकानी पड़ी। चार जून, 2003 को मौदहापारा इलाके में रामावतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।


