हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: लिव-इन में रह रही शादीशुदा महिला को पुलिस सुरक्षा, मौलिक अधिकारों का हवाला

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक लिव-इन में रह रहे जोड़े को पुलिस सुरक्षा प्रदान करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक व्यक्ति का जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सुरक्षित है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहले से किसी वैवाहिक बंधन में होने के बावजूद, यह अधिकार उनसे छीनना सही नहीं है। इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि व्यक्तिगत जीवन और सुरक्षा के मामले में कानून सभी नागरिकों के लिए समान रूप से लागू है, चाहे उनकी पारंपरिक वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो।

जस्टिस सौरभ बनर्जी ने कहा कि याचिकाकर्ता दोनों भारतीय नागरिक हैं, इसलिए वे संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत अपने मौलिक अधिकारों और सुरक्षा गारंटियों के हकदार हैं। जस्टिस बनर्जी ने स्पष्ट किया कि नागरिकों की स्थिति चाहे वे शादीशुदा, अविवाहित या लिव-इन रिलेशनशिप में हों इस अधिकार को प्रभावित नहीं करती। उन्होंने कहा कि इसके लिए कोई प्रासंगिक कारण या भेदभाव नहीं मान्य है।

महिला ने की थी सुरक्षा की मांग

दिल्ली हाई कोर्ट की बेंच ने दो बालिग व्यक्तियों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से सुरक्षा की मांग की थी, क्योंकि उन्हें परिवार और महिला के पति से कथित धमकियां और उत्पीड़न मिल रहा था। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि साथ रहने का फैसला लेने के बाद से उन्हें लगातार अपनी सुरक्षा को लेकर डर बना हुआ है। कोर्ट ने इस मामले में कहा कि उन्हें संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों के अनुसार सुरक्षा मिलना चाहिए।

क्या है मामला

याचिका के अनुसार, महिला 2016 से अपने पति द्वारा अपमान और यातना का शिकार रही। फरवरी 2026 में उसने हैदराबाद में याचिकाकर्ता 2 के साथ लिव-इन में रहने का निर्णय लिया। हालांकि, उनके परिवार द्वारा कथित धमकियों और स्थानीय पुलिस के दखल के कारण यह जोड़ा दिल्ली चला आया। उन्होंने सुरक्षा की गुहार लगाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत सुरक्षा मिलनी चाहिए। पुलिस को निर्देश दिए गए हैं कि वे इस जोड़े की व्यक्तिगत सुरक्षा और स्वतंत्रता सुनिश्चित करें, ताकि उन्हें धमकियों या उत्पीड़न से कोई खतरा न हो।

याचिकाकर्ता सुरक्षा का हकदार

दिल्ली हाई कोर्ट ने 6 अप्रैल को पारित आदेश में कहा कि याचिकाकर्ताओं को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार और व्यक्तिगत आजादी का अधिकार प्राप्त है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये अधिकार उन्हें संविधान के अनुच्छेद 21 और 19 के तहत सुरक्षा का हकदार बनाते हैं। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं, इसलिए उन्हें अपने निर्णय और निजी जीवन में स्वतंत्रता और सुरक्षा का पूरा अधिकार है। इस आदेश के तहत पुलिस को निर्देश दिए गए हैं कि वे याचिकाकर्ताओं की व्यक्तिगत सुरक्षा सुनिश्चित करें, ताकि किसी भी प्रकार की धमकी, उत्पीड़न या खतरे से उनकी स्वतंत्रता सुरक्षित रह सके।

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