साल दर साल वह एक-एक कर परीक्षा उत्तीर्ण करते हुए अब हाईस्कूल पहुंच चुकी है। वर्षों के अभ्यास से वह इतनी पारंगत हो चुकी है कि उसकी लिखावट किसी सामान्य बच्चे से कमतर नहीं है। राखी का परिवार कैकागढ़ पंचायत के बेंगलुरु गांव में रहता है।
पढ़ाई में बाधा नहीं गरीबी
उसके पिता धनसिंह नाग एक निजी गैस एजेंसी के लिए साइकिल से गांव–गांव घूमकर गैस सिलेंडर की डिलीवरी करते हैं। माता चैती घरेलू महिला है और इमली, महुआ जैसे वनोपज संग्रहण से अर्जित आय से घर चलाने में योगदान देती है।
माता–पिता ने निर्धनता को कभी भी राखी की पढ़ाई में बाधा नहीं बनने दिया। हमेशा ही उसे आगे बढ़ने-पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। अब राखी का सपना अपनी पढ़ाई पूरी कर आईएएस अधिकारी बनने का है। वह क्षेत्र के विकास में योगदान देना चाहती है।
इसके साथ ही वह कहती है उसके माता–पिता ने बढ़ी तकलीफें झेलकर उसे पढ़ा रहे हैं। आगे चलकर वह अपने माता–पिता को एक अच्छा जीवन देने की चाह रखती है।
स्कूल के शिक्षक मांझी ने बताया कि बालिका दोनों हाथ व एक पांव से दिव्यांग है। उसका भाई उसे प्रतिदिन साइकिल पर बिठाकर स्कूल लाता और ले जाता है। अभी जिस ट्राइसिकल पर वह बैठकर परीक्षा दे रही है, वह स्कूल की है।
उसने सरकार से ट्राइसिकल हासिल करने के लिए आवेदन किया था, लेकिन अभी तक उसे नहीं मिली है। ट्राइसिकल मिलने से वह स्वावंलबी तरीके से स्कूल आ-जा सकेगी। उसकी प्रतिभा विलक्षण है। वह इतनी सारी विषम परिस्थितियों के बाद भी जिंदगी की जंग लड़ रही है।