हाईकोर्ट ने एसपी के आदेश पर लगाई रोक, कहा- आपराधिक मामला और विभागीय जांच साथ-साथ नहीं चल सकते

बिलासपुर. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश देते हुए कहा कि जब किसी शासकीय कर्मचारी के खिलाफ समान आरोपों पर आपराधिक मामला न्यायालय में लंबित हो और उसी आधार पर विभागीय जांच भी शुरू कर दी गई हो, तो दोनों कार्यवाही एक साथ नहीं चलाई जा सकती. मामला सिविल लाइन, बलौदाबाजार निवासी पुलिस आरक्षक पी. के. मिश्रा से जुड़ा है, जो जिला बलौदाबाजार-भाटापारा में पदस्थ हैं.

क्या है मामला ?

जानकारी के अनुसार 28 मार्च 2025 को आरक्षक पी. के. मिश्रा के विरुद्ध थाना खरोरा में भारतीय न्याय संहिता की धारा 331(6) और 310(2) के तहत अपराध दर्ज किया गया था. इसके बाद 8 जून 2025 को संबंधित न्यायालय में चालान प्रस्तुत कर दिया गया और मामला न्यायालय में विचाराधीन है. इसी बीच 9 मई 2025 को पुलिस अधीक्षक, बलौदाबाजार-भाटापारा द्वारा उन्हीं आरोपों के आधार पर आरक्षक के विरुद्ध विभागीय आरोप पत्र जारी कर विभागीय जांच शुरू कर दी गई.

हाईकोर्ट में दी गई चुनौती

विभागीय जांच से आहत होकर आरक्षक ने अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय और वर्षा शर्मा के माध्यम से हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की. याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व के कई निर्णयों में स्पष्ट किया है कि यदि आपराधिक मामले और विभागीय जांच में आरोप तथा गवाह समान हों, तो पहले आपराधिक न्यायालय में साक्ष्य परीक्षण होना चाहिए. इस संबंध में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया वर्सेस नीलम नाग, कैप्टन एम. पॉल एंथोनी वर्सेस भारत गोल्ड माइंस लिमिटेड और अविनाश सदाशिव भोसले वर्सेस यूनियन ऑफ इंडिया जैसे मामलों का हवाला दिया गया. याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने दलील दी कि समान गवाहों के साथ विभागीय जांच जारी रहने से आपराधिक मामले की निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो सकती है और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा.

मुकदमे की कार्यवाही पूरी होना आवश्यक

दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए आरक्षक पी. के. मिश्रा के विरुद्ध संचालित विभागीय जांच कार्यवाही पर स्थगन (स्टे) लगा दिया. अदालत ने माना कि जब आपराधिक प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन है और दोनों मामलों में अभियोजन साक्षी समान हैं, तो पहले आपराधिक मुकदमे की कार्यवाही पूरी होना आवश्यक है.

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