महाराष्ट्र ही नहीं, भारत के इन राज्यों में भी मचती है गणेशोत्सव की धूम; पहले नहीं देखा होगा बप्पा का ऐसा स्वागत

लाइफस्टाइल डेस्क। गणेश चतुर्थी का नाम सुनते ही मन में उत्साह और ‘गणपति बाप्पा मोरया’ की गूंज उठने लगती है। पूरे देश में यह पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर राज्य में बप्पा की पूजा का तरीका एकदम अलग है?

कहीं इको-फ्रेंडली मूर्तियां बनती हैं, तो कहीं आरती के बाद गरबा खेला जाता है। आइए, इस आर्टिकल में जानते हैं कि भारत के विभिन्न कोनों में विघ्नहर्ता का स्वागत किस अनोखे अंदाज में किया जाता है (Ganeshotsav celebrations in India)।

Ganesh Chaturthi in india

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महाराष्ट्र में दिखती है गणेश उत्सव की खास छटा

महाराष्ट्र को गणेश उत्सव (Ganesh Utsav 2026) का केंद्र कहा जाए, तो बिल्कुल गलत नहीं होगा। यहां का ‘आगमन सोहला’ और ढोल-ताशे की धुन रोंगटे खड़े कर देती है। नौवारी साड़ी और पारंपरिक कपड़ों में सजे लोग जब मुंबई-पुणे के मशहूर पंडालों में दर्शन के लिए पहुंचते हैं, तो छटा ही अलग होती है। 3 से 10 दिन तक चलने वाले इस पर्व का समापन गिरगांव चौपाटी पर भव्य विसर्जन के साथ होता है।

वहीं, पड़ोसी राज्य गोवा में इस त्योहार को ‘चवथ’ कहा जाता है। यह पूरी तरह से एक पारिवारिक आयोजन है। यहां की सबसे दिलचस्प बात है ‘माटोली’ परंपरा। इसमें भगवान के पूजा स्थल को जंगली वनस्पतियों, फलों और फूलों से बेहद खूबसूरती से सजाया जाता है और घर में मिट्टी की मूर्ति स्थापित की जाती है।

MP-छत्तीसगढ़ और गुजरात में भी है बप्पा की धूम

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पूरे दस दिन तक महाराष्ट्र जैसी ही रौनक रहती है। मध्य प्रदेश के इंदौर में कपड़ा मिलों की ओर से निकलने वाली झांकियां और अनंत चतुर्दशी का ‘चल समारोह’ इतिहास में दर्ज है। भोपाल, ग्वालियर, रायपुर और भिलाई में भी शानदार पंडाल सजते हैं।

गुजरात में बप्पा के पंडालों में एक अलग ही सांस्कृतिक छटा दिखती है। यहां शाम की आरती के बाद भगवान के सामने पारंपरिक गरबा और रास खेला जाता है।

बाप्पा के स्वागत का दक्षिण भारतीय अंदाज

कर्नाटक में गणेश उत्सव का नाता माता पार्वती से भी जुड़ा है। यहां बप्पा के आने से ठीक एक दिन पहले ‘गौरी हब्बा’ मनाया जाता है और भगवान को ‘कड़ाबू’ का भोग लगता है। बेंगलुरु और हुबली के पंडाल बहुत ही भव्य होते हैं। तेलंगाना की बात करें, तो हैदराबाद का ‘खैराताबाद’ इलाका अपनी विशालकाय गणेश प्रतिमा के लिए दुनियाभर में मशहूर है। यहां विसर्जन का जुलूस सीधे हुसैन सागर झील तक जाता है।

तमिलनाडु में इसे विनायक चतुर्थी कहते हैं। यहां और केरल में यह पर्व 1 से 3 दिन का होता है। तमिलनाडु के लोग सफेद मिट्टी से इको-फ्रेंडली गजानन बनाते हैं। केरल के कोच्चि और तिरुवनंतपुरम के प्रमुख मंदिरों में खास पूजा होती है, जहां गणपति को ‘कोझुकट्टई’ का भोग लगाया जाता है।

ganesh utsav 2026

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राजस्थान, यूपी और पंजाब का उल्लास

राजस्थान के जयपुर में ‘मोती डूंगरी गणेश मंदिर’ इस उत्सव का मुख्य केंद्र होता है। यहां लाखों भक्त दर्शन करने आते हैं और हजारों किलो मोदक का प्रसाद भगवान को चढ़ाया जाता है।

उत्तर प्रदेश में भी अब गली-मोहल्लों में पंडाल लगने लगे हैं। हालांकि, वाराणसी का अंदाज सबसे जुदा है। यहां गंगा घाटों पर बप्पा की आरती उतारी जाती है और बाद में कुंडों या गंगा नदी में ही उनका विसर्जन होता है। पंजाब के लुधियाना, जालंधर और अमृतसर जैसे शहरों में भी तीन से पांच दिन तक सार्वजनिक मंडलों में यह त्योहार उल्लास के साथ मनाया जाता है।

बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों की आस्था

पश्चिम बंगाल और ओडिशा में गणेश पूजा का स्वरूप थोड़ा अलग है। यहां यह मुख्य रूप से कॉलेज, कला केंद्रों और व्यावसायिक परिसरों में मनाया जाता है। इन जगहों पर पंडालों की सजावट और सांस्कृतिक कार्यक्रम आकर्षण का केंद्र होते हैं।

मेघालय, मिजोरम और नागालैंड जैसे ईसाई बहुल पूर्वोत्तर राज्यों में भले ही सड़कों पर बड़ी झांकियां न दिखें, लेकिन वहां रहने वाले हिंदू समुदाय के लोग पूरी आस्था और शांति के साथ अपने घरों तथा स्थानीय मंदिरों में गजानन की पूजा अर्चना करते हैं।

भले ही हर राज्य में पूजा के दिन, प्रसाद या सजावट के तरीके अलग हों, लेकिन भव्य झांकियां सजाने का शौक और विघ्नहर्ता के लिए भक्तों का अथाह प्रेम पूरे देश को एक धागे में पिरो देता है।

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