अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के खिलाफ अत्याचार रोकने के लिए बनाए गए SC/ST अत्याचार निवारण कानून के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट में इस अधिनियम के कुछ प्रावधानों के खिलाफ अर्जी दाखिल की गई. इस जनहित याचिका में एक्ट के कई प्रावधानों को समानता के अधिकार के खिलाफ बताया गया और उनमें बदलाव की मांग हुई.
कोर्ट ने याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए कहा कि आरोपी को उत्पीड़न से बचाने के लिए कानून में पर्याप्त उपाय मौजूद हैं.
याचिकाकर्ता बृजभूषण सैनी की ओर से कानून के कुछ प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए कहा गया था कि एक वर्ग को उत्पीड़न से बचाने के लिए बनाया गया कानून कहीं दूसरे वर्ग के उत्पीड़न का माध्यम न बन जाए. याचिकाकर्ता की तरफ से वकील विष्णु जैन ने कहा कि इस कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि इसमें सजा की दर बहुत कम है, जबकि गलत केस पर करोड़ों मुआवजा भी दिया गया है.
वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि बिना शुरुआती जांच के एफआईआर दर्ज करने और आरोपी को गिरफ्तार करने की व्यवस्था सही नहीं है. इससे कानून के दुरुपयोग की आशंका रहती है. धारा 18 के तहत आरोपी को अग्रिम ज़मानत से भी मना किया गया है.
हालांकि, चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह तर्क देते हुए सुनवाई से इनकार कर दिया कि 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट को वैध ठहराया था. सिर्फ 6 साल बाद ही उस फैसले की समीक्षा की कोई वजह नज़र नहीं आती.

