राजनांदगांव(दैनिक पहुना)। जैन बगीचे में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन में खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य मुनि श्रेयांशप्रभ सागर जी ने अपेक्षाओं और आशाओं के बीच अंतर समझाते हुए कहा कि अपेक्षाएं व्यक्ति को दुखी करती हैं, जबकि आशाएं जीवन में सकारात्मकता और आनंद बनाए रखती हैं। ज्ञान वल्लभ उपाश्रय भवन में आयोजित प्रवचन में मुनिश्री ने कहा कि एक अपेक्षा पूरी होते ही दूसरी अपेक्षा जन्म ले लेती है। व्यक्ति की अपेक्षाएं पूरी होती जाती हैं, वैसे-वैसे उनका दायरा भी बढ़ता जाता है। यही अपेक्षाएं धीरे-धीरे लोभ और क्रोध का कारण बन जाती हैं। इसके विपरीत आशा पूरी न होने पर भी व्यक्ति उसी तरह दुखी या क्रोधित नहीं होता।
मुनिश्री ने कहा कि यदि व्यक्ति अपेक्षाओं का त्याग कर दे तो उसका जीवन खुशियों से भर सकता है। अच्छे कार्यों के लिए अपेक्षा नहीं, बल्कि आशा रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पूरी तरह निरपेक्ष जीवन जीना कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। उन्होंने संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि जहां आशाएं होती हैं, वहां रिश्ते मजबूत होते जाते हैं, जबकि अपेक्षाएं संबंधों में दूरी पैदा करती हैं। आदेश देने वाली भाषा भी अपेक्षा से जुड़ी होती है। जब सामने वाला आदेश पूरा नहीं करता तो अपेक्षा टूटती है और व्यक्ति के मन में दुख, क्रोध तथा निराशा उत्पन्न होती है।
मुनिश्री ने कहा कि जीवन में दूसरों से अपेक्षाएं कम करके आशावादी दृष्टिकोण अपनाने से मन शांत रहेगा और रिश्तों में मधुरता बनी रहेगी। इस अवसर पर चातुर्मास समिति एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे। मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने जानकारी दी।

