बच्चों का कभी कंपैरिजन नहीं करना चाहिए : श्रेयांशप्रभ सागर

विनय दबना नहीं बल्कि बड़ों का सम्मान करना सिखाता है

‎‎राजनांदगांव(दैनिक पहुना)। जैन मुनि श्रेयांशप्रभ सागर जी ने कहा कि बड़ों को कभी बच्चों का कंपैरिजन नहीं करना चाहिए, इससे उनमें हीन और नफरत की भावना पैदा होती है। उन्हें वह करने दीजिए जो वह अच्छे से कर सकते हैं, उन पर दबाव मत बनाइए। उन्होंने कहा कि बच्चों को बड़ों का विनय करना चाहिए। विनय हमें सम्मान करना सिखाता है नाकि दबना।  मुनि श्री श्रेयांशप्रभ सागर जी ने कहा कि विनय बड़ों के सामने झुकना और आदर करना सिखाता है। विनय अपनी बात सही ढंग से बोलना सिखाता है। विनय आपकी भाषा में फिल्टर लगा देता है ताकि आपकी बात छनकर बाहर निकले। विनय चुप रहना नहीं सिखाता किंतु यह बताता है कि आपके पास जो भी है, वह बड़ों की कृपा से है,आपका कुछ भी नहीं।  मुनि श्री श्रेयाशप्रभ सागर जी ने कहा कि स्वीकार करना सीखिए। आपके पास जो है, उसे स्वीकार कीजिए और जो नहीं है उसे पाने का प्रयास करें। क्या ग्रहण करना है उसे समझें और फिर ग्रहण करें।

उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि एक शराबी पिता के दो बच्चे थे उनमें से एक ने पिता के शराब पीने के गुण को अपनाया जबकि दूसरे ने शराब से नफरत कर उसके दोषों को देखा। इसका असर यह हुआ कि पहले पुत्र जिसने पिता की राह चुनी, वह अशांत रहा जबकि दूसरे ने शराब से दूर रहने की सोंची और उसका परिवार शांत और समृद्ध हो गया। उन्होंने कहा कि किसी भी चीज को ग्रहण करने के लिए हममें उसकी समझ होनी चाहिए और सोच समझ कर ही किसी भी चीज को ग्रहण करना चाहिए। मुनि श्री ने कहा कि बच्चों में कंपैरिजन कर उन्हें हतोत्साहित न करें बल्कि उन्हें उनकी रुचि के काम ही करने दे। अच्छा काम करने पर उन्हें शाबाशी देखकर प्रोत्साहित करें। ऐसा करने पर उन्हें शक्ति मिलेगी और वे दुगुने उत्साह से काम करने लगेंगे।

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