विशेष अदालत से भी खारिज हुई थी जमानत
गिरफ्तारी के बाद EOW ने नारायण साहू को जेल भेज दिया था। इसके बाद आरोपी ने EOW की विशेष अदालत में जमानत के लिए आवेदन लगाया था, लेकिन अदालत ने उसकी याचिका खारिज कर दी।
विशेष अदालत से राहत नहीं मिलने पर उसने हाई कोर्ट में जमानत याचिका दायर की। अपनी याचिका में नारायण साहू ने दावा किया कि जांच एजेंसी को उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं। उसने कहा कि वह सिर्फ कारोबारी का ड्राइवर था और कथित कोयला घोटाले में उसकी कोई भूमिका नहीं है।
आरोपी ने यह भी आरोप लगाया कि पहले उस पर कुछ लोगों के खिलाफ बयान देने का दबाव बनाया गया और बाद में उसे मामले में फंसाया गया।
राज्य सरकार ने किया जमानत का विरोध
राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने कोर्ट में जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि जांच एजेंसियों को कई ऐसे दस्तावेज मिले हैं, जिनसे करोड़ों रुपए की अवैध वसूली और लेन-देन का लिंक सामने आया है।
राज्य शासन के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि नारायण साहू कथित कोल लेवी सिंडिकेट के जरिए करीब 13 करोड़ रुपए की नकद अवैध वसूली में शामिल था। वह लगभग ढाई साल तक फरार रहा और लगातार जांच एजेंसियों से बचता रहा। इस दौरान उसने जांच में सहयोग भी नहीं किया। मामले में पहले ही कोर्ट आरोपी के खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी कर चुका था।
कोर्ट ने माने गंभीर और ठोस सबूत
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने माना कि जांच एजेंसियों के पास नारायण साहू के खिलाफ गंभीर और ठोस साक्ष्य मौजूद हैं। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि वह सूर्यकांत तिवारी का भरोसेमंद व्यक्ति था और कथित अवैध वसूली तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था। जांच के दौरान जब्त की गई हस्तलिखित डायरी में भी नारायण साहू के नाम से कई एंट्रियां मिलने का दावा किया गया है।
क्या है कोयला लेवी घोटाला
प्रवर्तन निदेशालय (ED) के अनुसार छत्तीसगढ़ में कोयला परिवहन और परमिट प्रक्रिया में अनियमितताओं के जरिए करीब 570 करोड़ रुपए से अधिक की अवैध वसूली की गई। मामले में 36 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। जांच एजेंसी का आरोप है कि ऑनलाइन जारी होने वाले कोयला परिवहन परमिट को ऑफलाइन कर वसूली का नेटवर्क तैयार किया गया था। इस मामले में पूर्व मंत्रियों, विधायकों, अधिकारियों और कारोबारियों सहित कई लोगों के खिलाफ जांच जारी है।


