राजनांदगांव(दैनिक पहुना)। जैन मुनि श्रेयांशप्रभ सागर जी ने कहा कि अतीत नहीं होता तो आज हम जो हैं, वह बन नहीं पाते। अतीत हमें जीवन की गलतियों से सीख लेकर स्वयं में सुधार करने का अवसर देता है। इसलिए बीती बातों को लेकर दुखी होने के बजाय उनसे सीख लेकर भविष्य को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए। ज्ञानवल्लभ भवन में चतुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में मुनिश्री ने कहा कि पुराना बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है, लेकिन जो हमारे आगे बढ़ने में सहायक रहा हो, उसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम अक्सर यह देखते हैं कि हम क्या नहीं कर पा रहे हैं, लेकिन यह देखने का प्रयास नहीं करते कि हम क्या कर सकते हैं। डर हमारे विचारों पर हावी हो जाए तो हम कोई भी कार्य सही ढंग से नहीं कर पाते।
मुनिश्री ने कहा कि पुराना मकान छोड़कर नए मकान में जाते समय हम उसकी ईंट-पत्थर अपने साथ नहीं लाते। उसी प्रकार जीवन की पुरानी और दुखद बातों को वहीं छोड़ देना चाहिए। गलतियां हर व्यक्ति से होती हैं, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि हम अपनी गलतियों को स्वीकार कर उनमें सुधार करें। गलतियों को लेकर बैठकर पछताते रहना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि अतीत को अपने भविष्य की राह में रोड़ा नहीं बनने देना चाहिए। घर छोड़कर व्यक्ति भाग सकता है, लेकिन स्वयं से भागना संभव नहीं है। इसलिए समस्याओं से भागने के बजाय उनका सामना करें और अपने भीतर सुधार लाएं। अतीत से सीख लेकर वर्तमान को बेहतर बनाना ही जीवन की सही दिशा है।

