इंद्रियों का पोषण नहीं, शोषण करना सीखें, तभी तप का मिलेगा समुचित लाभ
राजनांदगांव(दैनिक पहुना)। खरतरगच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य मुनि श्री समयप्रभ सागर जी ने कहा कि जीवन में हम जो भी अनुष्ठान, जप या तप करें, उसके प्रति हमारी सच्ची और पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिए। केवल बाहरी रूप से तप करने से उसका वास्तविक लाभ प्राप्त नहीं होता। तप के दौरान यदि मन पारणा और भौतिक सुख-सुविधाओं की ओर लगा रहे तो तप की साधना अधूरी रह जाती है। ज्ञान वल्लभ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में मुनि श्री समयप्रभ सागर जी ने कहा कि हमें किसी भी धार्मिक साधना को पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य को इंद्रियों का पोषण करने के बजाय उनका शोषण करना सीखना चाहिए। इंद्रियों के प्रति अत्यधिक आसक्ति ही मनुष्य को उसके वास्तविक लक्ष्य से भटकाती है।
मुनि श्री ने कहा कि हमें व्यवहार में जीना होता है और अपने व्यवहार के माध्यम से ही समाज को सही संदेश दिया जा सकता है। तप का वास्तविक लाभ तभी प्राप्त होगा, जब हम अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित करेंगे। उन्होंने कहा कि अक्सर व्यक्ति तप तो करता है, लेकिन उसके मन में पारणा को लेकर विचार चलते रहते हैं। ऐसी स्थिति में तप की एकाग्रता भंग होती है और साधना का अपेक्षित फल नहीं मिल पाता। उन्होंने कहा कि भोजन का संस्कार मनुष्य को जन्मों से मिला हुआ है, इसलिए इंद्रियों के प्रति आसक्ति से बचना आसान नहीं है। इसके लिए जागरूकता और आत्मसंयम आवश्यक है। समझदार व्यक्ति इंद्रियों के आकर्षण से स्वयं को बचाते हुए अपनी साधना के प्रति आस्था बनाए रखते हैं।
मुनि श्री समयप्रभ सागर जी ने कहा कि आस्था ही मनुष्य को स्वयं पर नियंत्रण रखना सिखाती है। हमें जागृत होकर परमात्मा की वाणी का चिंतन करना चाहिए। जब साधना में श्रद्धा, निष्ठा और आत्मसंयम जुड़ जाते हैं, तब व्यक्ति अपने निर्धारित लक्ष्य की ओर निश्चित रूप से आगे बढ़ सकता है।

