राजनांदगांव(दैनिक पहुना)। जैन बगीचा स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय भवन में धर्मसभा को संबोधित करते हुए खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य मुनि श्रेयांशप्रभ सागर जी ने कहा कि कुछ पाने के उद्देश्य से किया गया सौदा व्यापार होता है, लेकिन माता-पिता, भाई-बहन और परिवार के बीच होने वाला लेन-देन व्यापार नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि किसी पर अपनी इच्छा थोपना उचित नहीं है। मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति जब किसी कार्य को कुछ पाने की इच्छा से करता है और अपेक्षित परिणाम नहीं मिलता, तो वह उसे त्याग का नाम दे देता है, जबकि वास्तव में वह त्याग नहीं होता। हम जो भी करते हैं, प्रायः अपनी इच्छा और अपने स्वार्थ के लिए करते हैं। जब किसी के लिए बिना किसी अपेक्षा और स्वार्थ के कुछ किया जाता है, तभी वह वास्तविक त्याग कहलाता है। उन्होंने कहा कि अपने स्वार्थ को निस्वार्थ समझना ही मिथ्यात्व है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन आत्मचिंतन करना चाहिए। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक किए गए कार्यों पर विचार करना चाहिए कि हमने क्या सही किया और क्या गलत। यदि प्रतिदिन इस प्रकार आत्ममंथन किया जाए तो निश्चित रूप से हमारी दृष्टि में सुधार आएगा और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आएगा। मुनि श्रेयांशप्रभ जी ने कहा कि भौतिक वस्तु प्राप्त होने पर हम उसे अपने पास सुरक्षित रखना चाहते हैं, लेकिन आत्मा के पोषण वाली चीजों को अपने जीवन में स्थायी रूप से अपनाने की कोशिश नहीं करते। आज त्याग की भावना कमजोर होती जा रही है। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं से यह प्रश्न करे कि जिसे वह त्याग समझ रहा है, क्या वह वास्तव में त्याग है?
उन्होंने स्पष्ट किया कि बिना कुछ छोड़े त्याग संभव नहीं है। हमारे लिए त्याग का अर्थ अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें छोड़ना है। उन्होंने कहा कि हमें विचार करना चाहिए कि हम कोई कार्य अपनी इच्छा से कर रहे हैं या अपनी इच्छा का त्याग करके। हमारी वाणी और व्यवहार में भी स्पष्टता होनी चाहिए, ताकि हमारी बातों से किसी प्रकार की गलतफहमी उत्पन्न न हो। ऐसा करने से वर्तमान भी सुधरेगा और भविष्य भी बेहतर बनेगा। मुनि श्री ने कहा कि इच्छा को इच्छा ही रहने दें, उसे त्याग का नाम न दें। सच्चा त्याग वही है, जिसमें किसी प्रकार की अपेक्षा या स्वार्थ न हो।

