जैन बगीचा में संवत्सरी पर्व के छठवें दिन हुआ चातुर्मासिक प्रवचन
राजनांदगांव(दैनिक पहुना)। छोटे हों या बड़े, सभी के प्रति हमारे मन में विनय और नम्रता का भाव होना चाहिए। जहां सुगंध होती है, वहां जीव स्वतः आकर्षित होते हैं। इसी तरह विनयवान और नम्र व्यक्ति के प्रति भी लोग सहज रूप से आकर्षित होते हैं। इसलिए जीवन में अहंकार छोड़कर विनयशीलता को अपनाना चाहिए। यह विचार खरतरगच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य मुनि श्रेयांशप्रभ सागर जी ने जैन बगीचा स्थित नए हाल में संवत्सरी पर्व के छठवें दिन आयोजित चातुर्मासिक प्रवचन में व्यक्त किए।
मुनिश्री ने कहा कि किसी भी तीर्थंकर की दीक्षा नवलोकान्तिक देव की अनुमति के बिना नहीं हो सकती। परमात्मा किसी को माप-तौलकर नहीं देते, बल्कि जो उनके पास आता है, उसे दिल खोलकर प्रदान करते हैं। हम पचकान भाव ग्रहण करने के लिए लेते हैं, जबकि परमात्मा के पास पहले से ही शुद्ध भाव विद्यमान हैं। उन्होंने कहा कि समय की आवश्यकता केवल मन को होती है, शरीर को नहीं। शरीर को जब भी आदेश दिया जाए, वह कार्य करने के लिए तैयार रहता है। मनुष्य को स्वतंत्रता मिलते ही वह एक स्थान पर टिकना भूल जाता है। आज अधिकांश संबंध भी आवश्यकता और स्वार्थ से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक जीव को अपने कर्म स्वयं के पुरुषार्थ से बनाने पड़ते हैं।
मुनिश्री ने कहा कि सामने वाले के मन में हमारे प्रति क्रोध का भाव हो, तब भी हमें शांत रहना चाहिए। सामने वाला चाहे जैसा व्यवहार करे, हमारा आचरण ऐसा होना चाहिए कि उसके व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन आए और वह हमारे प्रति विनयवान हो जाए। हमारे द्वारा छोड़ी गई ऊर्जा यदि शुद्ध होगी तो सामने वाले के भाव भी बदल सकते हैं।
उन्होंने कहा कि मन में गलत विचार आना स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें टिकने नहीं देना चाहिए। श्रद्धा जानकारी और समझ के बाद ही उत्पन्न होती है। जब तक हम किसी व्यक्ति या विषय को जानते नहीं, तब तक उसके प्रति वास्तविक श्रद्धा पैदा नहीं हो सकती। चातुर्मास समिति के संयोजक पीयूष बैद एवं गुलाब गोलछा ने बताया कि प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने सहभागिता की।

