पितृ पक्ष में अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए परिजनों के लिए क्यों खास है चतुर्दशी श्राद्ध …

धर्म डेस्क। पितृ पक्ष का समय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए बहुत पवित्र होता है। भाद्रपद की पूर्णिमा से शुरू होकर सर्वपितृ अमावस्या तक चलने वाले इन 16 दिनों में हर तिथि का अपना अलग महत्व है। पितृ पक्ष की ‘चतुर्दशी तिथि’ को शास्त्रों में बहुत महत्वपूर्ण और खास दर्जा दिया है। इसे ‘अकाल मृत्यु श्राद्ध’ या ‘शस्त्र हत श्राद्ध’ भी कहा जाता है। आमतौर पर इंसान की मृत्यु जिस तिथि को होती है। पितृ पक्ष में उसी तिथि पर उसका श्राद्ध किया जाता है। किन्तु चतुर्दशी तिथि के नियम थोड़े अलग हैं। यदि किसी परिजन की मृत्यु स्वाभाविक रूप से वृद्धावस्था या सामान्य बीमारी से चतुर्दशी तिथि को हुई हो, तब भी उनका श्राद्ध इस दिन न करके सर्वपितृ अमावस्या के दिन किया जाता है।चतुर्दशी तिथि केवल और केवल उन दिवंगत प्रियजनों के लिए आरक्षित रखी गई है।जिनकी मृत्यु असमय या अप्राकृतिक परिस्थितियों में होती हैं।

चतुर्दशी श्राद्ध से जुड़ी खास परंपरा

लोक-परंपरा के अनुसार जो लोग दुर्घटना अस्त्र-शस्त्र के प्रहार, जहर, पानी में डूबने, आग में जलने, सर्पदंश, या किसी भी प्रकार की अप्राकृतिक घटना और दुर्घटना का शिकार होकर असमय संसार से विदा हो जाते हैं।उनकी सांसारिक इच्छाएं अधूरी रह जाती हैं।ऐसी आत्माओं को भटकने से बचाने उनकी आत्मिक शांति और मोक्ष के लिए चतुर्दशी तिथि पर तर्पण व पिंडदान करना अनिवार्य माना गया है। इस दिन विधि-विधान से किए गए तर्पण और दान-पुण्य से पूर्वज खुश होते हैं।जिससे परिवार को पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और घर में सुख-समृद्धि आती है।

चतुर्दशी श्राद्ध कौन करता है

  1. जिन परिवारों में किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हुई हो, उनके पुत्र, भाई या परिवार का कोई भी निकटतम पुरुष सदस्य यह श्राद्ध कर सकता है।
  2. देश की रक्षा करते हुए या युद्ध क्षेत्र में प्राण गंवाने वाले वीरों और सैनिकों का श्राद्ध भी इसी तिथि पर करने का विधान है।
  3. सामान्य या प्राकृतिक रूप से दिवंगत हुए परिजनों का श्राद्ध चतुर्दशी को करने की सख्त मनाही होती है। ऐसे पितरों का श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या को ही किया जाना चाहिए।

चतुर्दशी श्राद्ध का शुभ मुहूर्त और समय

पर्व-तिथि की गणना के अनुसार चतुर्दशी तिथि का प्रारंभ 8 अक्टूबर की रात 10:15 बजे से हो रहा है। जो 9 अक्टूबर की रात 9:35 बजे तक रहेगी। इसलिए चतुर्दशी का मुख्य श्राद्ध और तर्पण अनुष्ठान 9 अक्टूबर को ही पूरा किया जाएगा।

कुतप मुहूर्त सुबह 11:45 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक रहेगा।
रौहिण मुहूर्त दोपहर 12:31 बजे से दोपहर 01:18 बजे तक रहेगा।
अपराह्न काल: दोपहर 01:18 बजे से दोपहर 03:38 बजे तक।
शास्त्रों के अनुसार दोपहर के समय विशेषकर कुतप और अपराह्न काल पितरों के निमित्त किया गया तर्पण और ब्राह्मण भोजन सबसे फलदाय होता है। इस शुभ मुहूर्त में किया गया दान-पुण्य असमय दिवंगत हुए पितरों को तृप्ति प्रदान करता है।

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