राजनांदगांव (दैनिक पहुना)। खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य मुनि श्री समयप्रभ सागर जी ने कहा कि जीवन में परिस्थितियां कभी अनुकूल तो कभी प्रतिकूल होती हैं। ये परिस्थितियां साधक की परीक्षा और कसौटी के रूप में आती हैं। कितनी भी परेशानी सामने आए, व्यक्ति को अपने मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिए। यदि हम अपने लक्ष्य और संकल्प के प्रति अडिग रहें तो सफलता अवश्य प्राप्त होती है।
ज्ञान वल्लभ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान मुनि श्री समयप्रभ सागर जी ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई संकल्प होना चाहिए। उस संकल्प को पूरा करने के लिए पूरी ऊर्जा और सामर्थ्य लगानी चाहिए। उन्होंने कहा कि व्यक्ति के भीतर अपार शक्ति है, आवश्यकता केवल उसे सही दिशा में लगाने की है। संकल्प की पूर्ति के लिए अपनी शक्ति का सदुपयोग करना चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि हमारे शरीर में निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं। शरीर में हजारों नाड़ियां हैं, जिन्हें नियंत्रित करना आवश्यक है। जब व्यक्ति अपनी ऊर्जा और इंद्रियों को नियंत्रित करता है, तभी वह अपने उद्देश्य की ओर सही ढंग से आगे बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षित और अप्रशिक्षित व्यक्ति के कार्य में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। भाव बदलने से यात्रा और जीवन की दिशा भी बदल जाती है। हमारा उद्देश्य जिस प्रकार का है, उसी के अनुरूप हमारे कर्म भी होने चाहिए।
उन्होंने तत्वज्ञान की चर्चा करते हुए कहा कि शुरुआत में तत्वों का ज्ञान एक नीरस या कठिन विषय लग सकता है, लेकिन जब व्यक्ति इसे समझने और आत्मसात करने लगता है तो उसकी रुचि बढ़ती जाती है। साधक तत्वज्ञान की साधना में धीरे-धीरे पूरी तरह डूब जाता है। जब उसे तत्वज्ञान के आनंद की अनुभूति होने लगती है, तब बाहरी सुखों की आवश्यकता कम हो जाती है।
मुनि श्री समयप्रभ जी ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति एक माला का ध्यान भी निश्चित स्थान और निश्चित समय पर नियमित रूप से करे तो उसे अद्वितीय आनंद की अनुभूति हो सकती है। नियमित साधना, दृढ़ संकल्प और सही दिशा में प्रयास व्यक्ति को आत्मिक उन्नति की ओर ले जाते हैं।

