बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल विवाहित होने के आधार पर किसी बेटी को मृतक कर्मचारी के आश्रित होने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि शादी के बाद बेटी अपने माता-पिता के परिवार की सदस्य नहीं रहती, यह धारणा लैंगिक रूढ़िवादिता पर आधारित और संविधान के समानता के सिद्धांत के विपरीत है।
न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने अफीफा खान उर्फ देवांगी चौधरी द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए बैंक आफ महाराष्ट्र द्वारा अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन खारिज करने का आदेश निरस्त कर दिया। अदालत ने बैंक को निर्देश दिया कि सुप्रीम कोर्ट के कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के निर्णय के आलोक में 30 दिनों के भीतर आवेदन पर नए सिरे से फैसला लिया जाए।
याचिकाकर्ता के पिता देवाशीष चौधरी बैंक आफ महाराष्ट्र में डिप्टी मैनेजर थे। सेवा के दौरान उनके निधन के बाद इकलौती बेटी अफीफा खान ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। बैंक ने यह कहते हुए आवेदन अस्वीकार कर दिया कि वह विवाहित हैं और विवाह के बाद पति पर आश्रित मानी जाएंगी, इसलिए पिता के परिवार की आश्रित सदस्य नहीं हैं। याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि बैंक की कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 का उल्लंघन है। बैंक की नीति में केवल आश्रित पुत्री का उल्लेख है, विवाहित पुत्री को अपात्र घोषित नहीं किया गया है। दूसरी ओर बैंक ने 2022 के एक सुप्रीम कोर्ट फैसले का हवाला देते हुए अपने निर्णय का बचाव किया, लेकिन हाई कोर्ट ने कहा कि बाद में आए कुलसुम निशा (2026) के निर्णय ने विधि की स्थिति स्पष्ट कर दी है।
हाई कोर्ट ने दिया सुप्रीम कोर्ट का हवाला
हाई कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शादी के बाद भी बेटी का अपने माता-पिता से संबंध समाप्त नहीं होता। विवाहित बेटों को आश्रित मानने में कोई रोक नहीं, जबकि विवाहित बेटियों को बाहर करना लैंगिक भेदभाव है। किसी व्यक्ति के आश्रित होने का निर्धारण उसकी वास्तविक आर्थिक स्थिति से होगा, केवल वैवाहिक स्थिति से नहीं।
बैंक का आदेश रद, नए आवेदन पर विचार के निर्देश
अदालत ने पाया कि बैंक ने बिना किसी तथ्यात्मक जांच के केवल विवाह के आधार पर यह मान लिया कि याचिकाकर्ता अपने पिता पर आश्रित नहीं थी।
हाई कोर्ट ने बैंक आफ महाराष्ट्र के 27 अक्टूबर 2026 के आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के आवेदन पर नए सिरे से विचार किया जाए। बैंक को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप 30 दिनों के भीतर कारणयुक्त निर्णय लेने का आदेश दिया गया है।

