‘आर्य समाज मंदिर में मुस्लिम युवती से शादी वैध नहीं…’, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने वैवाहिक दर्जे और भरण-पोषण के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई मुस्लिम महिला किसी हिंदू पुरुष से आर्य समाज मंदिर की परंपराओं के अनुसार विवाह करने का दावा करती है, तो केवल आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाण-पत्र और शुद्धि प्रमाण-पत्र के आधार पर उसे कानूनी रूप से विवाहित पत्नी का दर्जा नहीं दिया जा सकता।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की एकलपीठ ने मनेंद्रगढ़ फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए कैंसर से पीड़ित महिला शायना परवीन उर्फ राधिका सुमन की क्रिमिनल रिवीजन याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि जब तक वैध वैवाहिक संबंध साबित नहीं होता, तब तक महिला पति से भरण-पोषण पाने की कानूनी हकदार नहीं बन सकती।

2017 में आर्य समाज मंदिर में विवाह का दावा

याचिकाकर्ता शायना परवीन उर्फ राधिका सुमन, निवासी खोंगापानी, मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर ने दावा किया था कि उसका विवाह 15 जून 2017 को रायपुर के बैजनाथपारा स्थित आर्य समाज मंदिर में घनश्याम सुमन, निवासी सारंगढ़ के साथ हुआ था।

महिला के अनुसार विवाह से पहले उसने शुद्धि संस्कार के माध्यम से वैदिक धर्म अपनाया था। शादी के करीब तीन साल बाद उसे कैंसर जैसी गंभीर बीमारी हो गई। महिला का आरोप था कि बीमारी के इलाज का खर्च उठाने से बचने के लिए पति ने उसे मायके छोड़ दिया और बाद में उससे दूरी बना ली।

महिला ने यह भी आरोप लगाया कि घनश्याम सुमन ने बाद में कविता नाम की महिला से दूसरी शादी कर ली। उसने बताया कि उसका कथित पति सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, जैजैपुर, जांजगीर-चांपा में सहायक ग्रेड-3 के पद पर कार्यरत है और उसकी मासिक आय करीब 80 हजार रुपये है। गंभीर बीमारी और आर्थिक परेशानी का हवाला देते हुए महिला ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 के तहत हर महीने 30 हजार रुपये भरण-पोषण की मांग की थी।

पति ने विवाह से किया इनकार, दोस्ती का बताया मामला

मामले में घनश्याम सुमन ने कोर्ट में महिला को अपनी पत्नी मानने से इनकार कर दिया। उसने दलील दी कि वह हिंदू है और महिला मुस्लिम थी, इसलिए दोनों के बीच कोई वैध विवाह नहीं हुआ।

पति ने बताया कि वह महिला के संपर्क में सोशल मीडिया के माध्यम से आया था। उसने दावा किया कि दोस्ती और मानवीय सहायता के तौर पर उसने महिला और उसके पिता के इलाज के लिए अप्रैल 2021 से सितंबर 2025 के बीच ऑनलाइन माध्यम से 9,07,900 रुपये और नकद 3 लाख रुपये की आर्थिक मदद की थी।

घनश्याम सुमन ने आरोप लगाया कि महिला उसे ब्लैकमेल कर पैसे वसूल रही थी और अब रकम वापस न करनी पड़े, इसलिए खुद को पत्नी बताकर अदालत पहुंची है। उसने यह भी कहा कि महिला के मेडिकल रिकॉर्ड में आज भी उसका नाम शायना परवीन दर्ज है और वह कोलियरी क्षेत्र में रामरूप चौधरी की पत्नी के रूप में रह रही है।

फैमिली कोर्ट ने पहले ही खारिज किया था दावा

मनेंद्रगढ़ फैमिली कोर्ट ने 19 मई 2026 को दिए अपने आदेश में माना था कि महिला अपनी आजीविका चलाने में असमर्थ है, लेकिन वह यह साबित नहीं कर सकी कि वह घनश्याम सुमन की कानूनी पत्नी है।

फैमिली कोर्ट ने आशीष मौर्य बनाम अनामिका धीमान मामले के न्यायिक सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा था कि आर्य समाज द्वारा जारी प्रमाण-पत्र अपने आप में विवाह की वैधानिकता साबित नहीं करते।

इसी आधार पर फैमिली कोर्ट ने महिला की भरण-पोषण याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद महिला ने इस आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन याचिका दायर की थी।

हाईकोर्ट ने कहा- बिना वैध विवाह के नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता

हाईकोर्ट में महिला की ओर से अधिवक्ता अली अफजाल मिर्जा ने तर्क दिया कि दोनों वर्ष 2017 से 2022 तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे थे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि लंबे समय तक साथ रहने से विवाह की धारणा बन सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि भरण-पोषण के मामलों में विवाह की वैधता की बहुत गहराई से जांच नहीं होनी चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा ने फैमिली कोर्ट के निष्कर्षों को सही माना। हाई कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने दोनों पक्षों के दस्तावेजों, दलीलों और उपलब्ध साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन करने के बाद फैसला दिया है। अदालत ने कहा कि भले ही महिला खुद का भरण-पोषण करने में असमर्थ हो, लेकिन जब तक पक्षों के बीच वैध वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं होता, तब तक भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 के तहत उसे गुजारा भत्ता नहीं दिया जा सकता।

इसके साथ ही हाई कोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि या अधिकार क्षेत्र से जुड़ी कमी नहीं है और महिला की क्रिमिनल रिवीजन याचिका को सारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।

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