नीट पेपर लीक होने से नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। एनटीए महज एक सोसायटी एक्ट के तहत रजिस्टर्ड संस्था है कोई संवैधानिक या स्वायत्त संस्था नहीं है। ऐसे में इसकी जवाबदेही सरकार के प्रति बेहद कम हो जाती है। पेपर लीक के बाद एनटीए की तुलना यूपीएससी और एसएससी से की जा रही है। NTA का गठन केवल 50 रुपये की मामूली फीस पर एक अस्थायी ‘सोसायटी मॉडल’ के तहत किया गया है.
देश की सबसे बड़ी परीक्षा एजेंसी NTA पर NEET पेपर लीक विवाद के बाद गंभीर सवाल उठे हैं. आपको जानकारी हैरानी हो सकती है कि महज 50 रुपये देकर एनटीए का रजिस्ट्रेशन हुआ था।
नीट (NEET-UG 2026) पेपर लीक विवाद के बाद देश की सबसे बड़ी परीक्षा एजेंसी यानी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) चौतरफा सवालों के घेरे में है. लेकिन अब जो सबसे बड़ा और हैरान करने वाला खुलासा हुआ है, वो NTA के प्रशासनिक ढांचे और उसके वजूद को लेकर है. सरकारी दस्तावेज़ों ने साफ कर दिया है कि जिस एजेंसी पर देश के करोड़ों बच्चों के भविष्य और इतनी संवेदनशील परीक्षाओं को निष्पक्ष कराने का जिम्मा है, उसकी बुनियादी नींव ही कितनी कमजोर और अस्थायी (एडहॉक) है.
सरकारी दस्तावेज़ों से पता चला है कि NTA का गठन केवल 50 रुपये की मामूली फीस पर एक अस्थायी ‘सोसायटी मॉडल’ के तहत किया गया है, जो UPSC और SSC जैसी संस्थाओं के मजबूत वैधानिक ढांचे से काफी कमजोर है. दस्तावेजों से जो सबसे चौंकाने वाली बात सामने आई है, वो यह है कि NTA का गठन किसी मजबूत संवैधानिक या स्वायत्त संस्था की तरह नहीं किया गया है.
एनटीए को संवैधानिक संस्था बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर हो चुकी है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि संवैधानिक संस्था बनने से एनटीए की जवाबदेही बढ़ेगी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सोसाएटी एक्ट के तहत सिर्फ 50 रुपये में एनटीए का रजिस्ट्रेशन हुआ था। राष्ट्रीय परीक्षण सेवा (नेशनल टेस्टिंग सर्विस) केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर की एक योजना है जो २००6-२००7 में शुरू की गयी थी।
शिक्षाविदों और आलोचकों का कहना है कि NTA के पास एक मजबूत वैधानिक ढांचे और स्पष्ट बायलॉज (उपनियमों) की भारी कमी है. इसी लचर व्यवस्था का नतीजा है कि परीक्षा संचालन और पेपर सेटिंग जैसे बेहद गोपनीय और संवेदनशील काम किसी को भी सौंप दिए जाते हैं, जिससे सिस्टम में सेंध लगाना आसान हो जाता है.


