हाथ में तंबूरा, लाल साड़ी और रौद्र रूप… 13 की उम्र में बहिष्कार झेलकर कैसे ‘पंडवानी की रानी’ बनीं तीजन बाई?

लाइफस्टाइल डेस्क। पंडावनी का नाम सुनते ही तंबूरा हाथ में थामे, लाल साड़ी पहने, रौद्र रूप में भीम का आह्वान करती तीजन बाई की छवि आंखों को सामने आ जाती है। पंडावनी का नाम तीजन बाई के बिना नहीं लिया जा सकता है, लेकिन क्या आप जानते हैं जिस तीजन बाई ने पंडावनी को पूरी दुनिया में मशहूर किया, उनके ही परिवार ने सिर्फ 13 की उम्र में उनका बहिष्कार कर दिया था, गांव वालों ने ताने दिए थे और शादी-शुदा जीवन तबाह हो गया था?

जी हां, आज तीजन बाई और पंडावनी को एक-दूसरे के बिना अधूरा माना जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ की इस लोक कला को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने की कहानी काफी मुश्किलों भरी रही है। आज तीजन बाई भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन इनकी कहानी किसी मिसाल से कम नहीं है। आइए जानें पंडावनी की मशहूर कलाकार तीजन बाई के जीवन की कहानी।

पंडावनी क्या है?

तीजन बाई की कहानी जानने से आपको ये समझना होगा कि पंडावनी होता क्या है। यह छत्तीसगढ़ की एक लोक कला है, जिसका मतलब होता है पांडवो की वाणी। इसमें महाभारत के प्रसंगों को संगीत और अभिनय के जरिए पेश किया जाता है।

इनमें पांडवों और महाभारत से जुड़ी कहानियां सुनाई जाती है और गायक हर किरदार का अभिनय करते हुए उस कहानी को गाता है। पंडवानी गायक के हाथ में एक तंबूरा होता है, जो कहानी सुनाते समय कभी भीम की गदा बन जाती है, तो कभी अर्जुन का धनुष।

पंडावनी को भी दो शैलियों में पेश किया जाता है। एक है वेदमती, जिसमें कलाकार बैठकर प्रस्तुति देता है। दूसरी शैली है कापालिक शैली, जिसमें कलाकार खड़े होकर, अभिनय करते हुए पूरे जोश के साथ महाभारत की कहानी सुनाता है।

तीजन बाई की कहानी

तीजन बाई का जन्म छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में एक गरीब पारधी आदिवासी परिवार में हुआ था। बचपन से ही वो अपने नाना को पंडवानी गाते सुनती थीं और यहीं से उनके मन में इस कला के लिए लगाव जागना शुरू हुआ।

वे नाना को पंडवानी गाते सुनतीं और इसे याद करती थीं। उस समय लड़कियों की शादी काफी कम उम्र में कर दी जाती थी। तीजन बाई की भी शादी सिर्फ 12 साल की उम्र में हो गई थी, लेकिन पंडवानी के लिए उनके जुनून समाज की इन सीमाओं को नहीं मानता था।

उस दौर में छत्तीसगढ़ में सिर्फ मर्द पंडवानी गा सकते थे। महिलाएं सुन सकती थीं, लेकिन गा नहीं सकती थीं। खासकर कापालिक शैली में तो बिल्कुल नहीं, लेकिन तीजन बाई इन नियमों को नहीं मानती थीं। वो भी बाकी पुरुषों की तरह पंडावनी गाना चाहती थीं।

Teejan Bai (1)

(Picture Courtesy: Instagram)

13 साल की उम्र में समाज से हुई बाहर

तीजन बाई के इस फैसले से पूरे समाज में तहलका मच गए। उनके परिवार ने उन्हें घर से निकाल दिया, समाज ने जात-बिरादरी से बाहर कर दिया, उन्हें उनके पति ने भी छोड़ दिया। समाज से बाहर निकाली हुई तीजन बाई को एक छोटी-सी झोपड़ी में अकेले रहना पड़ा, लेकिन उन्होंने पंडावनी के लिए अपने प्रेम को नहीं छोड़ा। उन्होंने गरीबी और बहिष्कार झेलते हुए, पंडावनी के लिए अपने जुनून को जगाए रखा और 13 साल की उम्र में पहली बार स्टेज पर पंडावनी गाया।

कला की दुनिया में पहचान

तीजन बाई की आवाज की खनक, चेहरे के भाव और तंबूरे को गदा की तरह हवा में भांजने का अंदाज लोगों के दिलों को छू गया। जिस छोटी बच्ची को उसके परिवार और समाज ने पंडावनी गाने के लिए त्याग दिया था, उसे बाकी दुनिया ने पूरे दिल से अपनाया। जल्द ही तीजन बाई को दूर-दूर से परफॉर्म करने के लिए ऑफर आने लगे। तीजन बाई ने कई प्रस्तुतियां दी, लेकिन एक परफॉर्मेंस ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी।

हबीब तनवीर से मुलाकात

1970 या 80 के दशक में तीजन बाई मध्य प्रदेश में परफॉर्म कर रही थीं, वहां उन्हें मशहूर थिएटर डायरेक्टर हबीब तनवीर ने देखा। उनकी कला देखकर वो दंग रह गए थे। उन्होंने तीजन बाई को अपने थिएटर ग्रुप में शामिल किया और यहीं से तीजन बाई को कई राष्ट्रीय और फिर अंतरराष्ट्रीय मंच मिले। इसके बाद तीजन बाई ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्जरलैंड और जर्मनी जैसे देशों में जाकर पंडावनी की धूम मचाई।

मिला सर्वोच्च नागरिक सम्मान

जिस तीजन बाई को कभी जिसके परिवार ने त्याग दिया था, उन्हें एक नहीं बल्कि देश के तीन सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा जा चुका है। भारत सरकार तीजन बाई को पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित कर चुकी है। ये सम्मान पंडावनी को जिंदा रखने में तीजन बाई के योगदान के गवाह हैं। इसके अलावा, उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और एशिया का प्रतिष्ठित फुकुओका पुरस्कार भी मिल चुका है।

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