Solar Eruption: शांत दिखने वाला हमारा सूर्य इस समय बेहद आक्रामक है। सूर्य की सतह पर भयंकर विस्फोट हुआ है। ये विस्फोट शक्तिशाली सौर विस्फोट है। सूरज की सतह पर इस पूरे हफ्ते से लगातार शक्तिशाली सौर विस्फोट हुए है। इससे अंतरिक्ष में मैग्नेटिक महातूफान (magnetic storm) आ गया है। मैग्नेटिक तूफान तेजी से धरती की और बढ़ रही है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा (NASA) और स्पेस वेदर प्रेडिक्शन सेंटर ने इसे लेकर बेहद गंभीर चेतावनी जारी की है।
नासा के मुताबिक सौर तूफान पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से टकराने वाला है, जिसके कारण अंतरिक्ष मौसम विभाग ने G3 कैटेगरी के भू-चुंबकीय तूफान यानी जियोमैग्नेटिक तूफान की घोषणा की है। इसके प्रभाव से भारत के उत्तरी हिस्सों, यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के आसमान में एक अनोखा और चमकीला नजारा देखने को मिल सकता है। इसे विज्ञान में ऑरोरा (Aurora) या उत्तरी रोशनी (Northern Lights) कहा जाता है।
अमेरिकी स्पेस एजेंसी के मुताबिक सूर्य की सतह पर ‘एक्टिव रीजन 4461’ नाम के एक बेहद सक्रिय हिस्से में 6 जून, 2026 की सुबह एक जोरदार धमाका हुआ। इस धमाके को वैज्ञानिकों ने M1.8 श्रेणी का सोलर फ्लेयर नाम दिया है। इस बार का यह विस्फोट इसलिए खास और चिंताजनक है क्योंकि इसके केंद्र से एक बेहद घना, भारी और अत्यधिक चुम्बकीय ‘फिलामेंट’ बाहर निकला है। यह फिलामेंट इस समय हमारे आंतरिक सौरमंडल को पार करते हुए 1,400 किलोमीटर प्रति सेकंड की अविश्वसनीय और डरावनी रफ्तार से सीधे पृथ्वी की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसे एक’टेक्स्टबुक कोर फिलामेंट इरप्शन कहा है, यानी एक ऐसा आदर्श विस्फोट जो सीधे तौर पर पृथ्वी के वायुमंडल को प्रभावित करने की पूरी क्षमता रखता है।
चुंबकीय क्षेत्र का S-शेप: जिसने बढ़ाई नासा की चिंता
वैज्ञानिकों ने बताया कि सूरज के जिस हिस्से से यह फिलामेंट निकला है, वहां की चुंबकीय रेखाएं अंग्रेजी के ‘S’ अक्षर के आकार में एक स्प्रिंग की तरह बुरी तरह आपस में उलझी और मरोड़ी हुई थीं। जब कोई चुंबकीय क्षेत्र इस तरह मुड़ जाता है, तो वह अपने अंदर अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा जमा कर लेता है। जैसे ही यह चुंबकीय तनाव अपनी चरम सीमा पर पहुंचा, ये रेखाएं अचानक टूट गईं और आपस में दोबारा जुड़ गईं। इस झटके से एक तरफ भयानक एक्स-रे (X-ray) विकिरण निकला, जिसने पृथ्वी पर रेडियो संचार व्यवस्था को प्रभावित किया।

क्या होता है फिलामेंट और कितना खतरनाक?
सूर्य का बाहरी वायुमंडल, जिसे कोरोना कहते हैं, वहां तापमान लगभग 10 से 20 लाख डिग्री सेल्सियस तक होता है। वहीं फिलामेंट के अंदर फंसी हुई प्लाज्मा का तापमान केवल 5,000 से 10,000 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है। सूर्य के पैमाने पर यह बेहद ठंडा और बहुत भारी माना जाता है। जब इस भारी गैस को थामे रखने वाला चुंबकीय पिंजरा कमजोर या अस्थिर हो जाता है, तो यह फिलामेंट अचानक टूट जाता है। रबर बैंड की तरह झटके से अंतरिक्ष में फैल जाता है।

भारत के आसमान में भी दिखेगी हरी-लाल रोशनी
चार्ज्ड सौर कण जब पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में मौजूद गैसों (जैसे ऑक्सीजन और नाइट्रोजन) से टकराते हैं, तो आसमान में हरे, बैंगनी और लाल रंग के खूबसूरत चमकदार पर्दे जैसे नजारे बनते हैं। आमतौर पर यह नजारा केवल ध्रुवीय क्षेत्रों (जैसे अलास्का, कनाडा या नॉर्वे) में ही दिखाई देता है। हालांकि जब सौर तूफान G3 (Strong) या उससे ऊपर G4 (Severe) श्रेणी का होता है, तो ऑरोरा का यह घेरा खिसककर नीचे आ जाता है। सोमवार या मंगलवार की रात को आसमान पूरी तरह साफ और अंधेरा रहता है, तो उत्तरी भारत (जैसे लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के ऊंचे इलाके) में उत्तरी रोशनी देखने को मिल सकती है।


