संचय के साथ दान-धर्म और आराधना पर भी दें ध्यान, आवश्यकता की सीमा न लांघें
राजनांदगांव(दैनिक पहुना)। खरतरगच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य मुनि समयप्रभ सागर जी ने कहा कि जीवन रहते कुछ ऐसा अर्जित कर लेना चाहिए, जिसका सदुपयोग किया जा सके। केवल संचय करते रहना पर्याप्त नहीं है। यदि जीवनभर धन-संपत्ति जुटाते रहे और उसका उपयोग नहीं किया तो अंतिम समय में पछतावे के अलावा कुछ हाथ नहीं आएगा। इसलिए आवश्यकता के अनुसार ही संचय करें और अतिरिक्त धन को दान-पुण्य में लगाएं।
ज्ञान वल्लभ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन में मुनिश्री ने कहा कि बुद्धिमान व्यक्ति तर्कवान हो सकता है, लेकिन जब तक उसमें विनय नहीं है, तब तक उसकी बुद्धिमत्ता का कोई विशेष मूल्य नहीं। उन्होंने सत्य बोलने को जीवन के लिए हितकारी बताते हुए कहा कि मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं की एक सीमा निर्धारित करनी चाहिए। सीमा से अधिक संग्रह करने की प्रवृत्ति से बचना जरूरी है।
मुनिश्री ने कहा कि साधना का मार्ग कठिन अवश्य है, लेकिन उसका फल सबसे अधिक मधुर होता है। मनुष्य को स्वयं प्रयास कर अपनी आसक्ति और मोह का त्याग करना होगा। उन्होंने कहा कि दान करने से पुण्य की वृद्धि होती है। इसलिए जीवन में धन-संपत्ति के संचय के साथ दान, धर्म और आराधना को भी स्थान देना चाहिए।
उन्होंने वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर चिंता जताते हुए कहा कि आज कई बेटे अपने माता-पिता का पालन-पोषण करने से कतराने लगे हैं। एक माता-पिता अपने पांच बच्चों का पालन-पोषण कर सकते हैं, लेकिन कई बार पांच बेटे मिलकर भी माता-पिता की जिम्मेदारी निभाने से पीछे हट जाते हैं। उन्होंने कहा कि किसी जीव को दुखी कर की गई साधना का अपेक्षित फल नहीं मिल सकता। आवश्यकता की सीमा होती है और मनुष्य को उस सीमा का उल्लंघन करने से बचना चाहिए।

