मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठ रहे सवालों के बीच चुनाव आयोग ने आवेदन, आपत्तियों और दस्तावेजों के सत्यापन से जुड़ी प्रक्रियाओं में कई बदलाव किए हैं। बिहार, पश्चिम बंगाल और दिल्ली में मतदाता सूची को लेकर विवाद के बीच इन कदमों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कांग्रेस और अन्य संगठनों के विरोध प्रदर्शनों के बीच आयोग ने पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करने और दस्तावेजी प्रक्रिया आसान बनाने पर जोर दिया है।
पश्चिम बंगाल में छूटे मतदाताओं को राहत
पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान मतदाता सूची से छूटे पात्र लोगों के नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है। राज्य के सभी 24 जिला निर्वाचन अधिकारियों (DEO) को विशेष शिविरों के जरिए मतदाताओं की समस्याएं दूर करने और यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं कि कोई पात्र नागरिक मताधिकार से वंचित न रहे।
दिल्ली में 33 लाख मामलों की जांच
दिल्ली में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान करीब 33 लाख मामलों में विसंगतियां सामने आने की बात कही गई। इनमें से लगभग 20 लाख मामलों के निपटारे की जानकारी दी गई है। शेष मामलों के समाधान के लिए भी अभियान जारी है। मतदाता अपने रिकॉर्ड की जांच और सुधार के लिए बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) से संपर्क कर सकते हैं।
फॉर्म-6 के अतिरिक्त घोषणापत्र पर विवाद
नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 के साथ अतिरिक्त घोषणापत्र जोड़े जाने पर विवाद हुआ। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने संशोधित फॉर्म-6 को मंजूरी नहीं दी थी। इसके बाद संबंधित अतिरिक्त घोषणापत्र को कुछ राज्यों में ऑनलाइन पोर्टल से हटाए जाने की जानकारी सामने आई।
फॉर्म-7 पर सीमा, BLO करेंगे घर जाकर मदद
मतदाता सूची से नाम हटाने या किसी नाम पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-7 पर भी सीमा तय किए जाने की बात कही गई है। इसका उद्देश्य बड़ी संख्या में आपत्तियां दाखिल कर नाम हटवाने की आशंका को नियंत्रित करना है।
इसके अलावा, नोटिस पाने वाले मतदाताओं के दस्तावेज जुटाने में BLO मदद करेंगे और जरूरत के अनुसार सुनवाई की प्रक्रिया आसान बनाई जाएगी।
SIR प्रक्रिया पर क्यों उठ रहे सवाल?
मतदाता सूची की शुद्धता और पात्र नागरिकों के मतदान अधिकारों के बीच संतुलन SIR विवाद का प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। आयोग के इन कदमों का उद्देश्य प्रक्रिया को सुगम बनाना बताया जा रहा है, जबकि नियमों की पारदर्शिता और उनके क्रियान्वयन पर बहस जारी है।

