60 साल पुराना कानून बदलेगी सरकार, नकली बीज पर नकेल कसेगा नया ‘बीज अधिनियम’

देश में नकली बीज बेचने वालों की अब खैर नहीं. दरअसल, संसद के आगामी सत्र में मोदी सरकार बीज अधिनियम लाने की तैयारी में है. इस प्रस्तावित बिल में नकली बीजों के कारोबार पर पूरी तरह से लगाम लगाने के लिए दोषियों पर भारी भरकम जुर्माना और जेल की सजा का प्रस्ताव शामिल है. बता दें कि, मोदी सरकार किसानों को नकली और घटिया गुणवत्ता वाले बीजों से बचाने के लिए एक मजबूत बीज अधिनियम बनाने की दिशा में काम कर रही है. नकली बीज के कारोबारियों पर नकेल कसने के लिए प्रस्तावित कानून में अपराधों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है:

प्रस्तावित कानून में पहली श्रेणी में मामूली उल्लंघन करने वाले कारोबारियों को रखा गया है. जिसमें पहली बार उल्लंघन पर चेतावनी दी जाएगी.

जबकि, दूसरी बार उल्लंघन करने पर 50,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा. जानकारी के मुताबिक, दूसरी श्रेणी में जानबूझकर किए गए उल्लंघन को रखा गया है. प्रस्तावित बीज कानून में कहा गया है कि यदि कोई कारोबारी जानबूझकर ऐसे काम करता है, मसलन

  • प्रोडक्ट पर QR कोड नहीं लगाना,
  • प्रोडक्ट पर आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं कराना,
  • गलत ब्रांडिंग करना जैसे मामलों को रखे जाने का प्रस्ताव

कितना रहेगा जुर्माना?

वैसे में इन मामलों में संलिप्त लोगों के खिलाफ हल्के आर्थिक दंड को सजा के रूप में रखा गया है, मसलन • पहली बार अपराध पर 1 लाख रुपये का जुर्माना • दूसरी बार अपराध पर 2 लाख रुपये का जुर्माना

वहीं प्रस्तावित बीज अधिनियम के तीसरे श्रेणी में गंभीर अपराध करने वालों को रखा गया है. जैसे नकली बीज बेचना, बिना पंजीकरण के कारोबार करना या फिर जानबूझकर धोखाधड़ी जैसे गंभीर अपराधों के लिए कड़े सजा का प्रस्ताव है.

प्रस्तावित बीज अधिनियम में अवैध और गंभीर बीज कारोबारियों के अपराध करने के खिलाफ 30 लाख रुपये तक का जुर्माना और जेल की सजा तक का प्रावधान प्रस्तावित है. प्रस्तावित कानून के तहत सभी बीज और रोपण सामग्री (Planting Material) का राष्ट्रीय रजिस्टर में पंजीकरण अनिवार्य होगा. साथ ही बिना पंजीकरण वाले बीजों को अवैध माना जाएगा और उन्हें बाजार में बेचने की अनुमति नहीं होगी.

हर पैकेट पर लगाया जाएगा QR कोड

प्रत्येक बीज पैकेट पर QR कोड लगाया जाएगा. इसके माध्यम से किसान बीज की उत्पत्ति, निर्माता, प्रयोगशाला से मिली मंजूरी, आपूर्ति श्रृंखला में उसकी आवाजाही जैसी जानकारी को ट्रैक कर सकेंगे.

बिल को लाने के पक्ष केंद्र सरकार का तर्क है कि लगभग 70% बीज मौजूदा बीज अधिनियम के दायरे से बाहर हैं. इसके अलावा, अलग-अलग राज्यों में बीज से संबंधित प्रक्रियाएं भी अलग-अलग हैं और मौजूदा कानून में निर्धारित दंड के प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं. इसी कारण नकली और घटिया गुणवत्ता वाले बीजों के खिलाफ मजबूत एवं प्रभावी कार्रवाई के लिए एक नए कानून की आवश्यकता है.

नए प्रस्तावित कानून किसानों के मौजूदा अधिकारों को सीमित नहीं करेगा. इसके तहत किसानों के पारंपरिक बीज अधिकार पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे. किसान पारंपरिक और किसान किस्म के बीजों का उपयोग, आदान-प्रदान और बिक्री पहले की तरह कर सकेंगे. पारंपरिक बीजों का पंजीकरण अनिवार्य नहीं होगा. यदि किसान चाहें तो वे स्वेच्छा से अपनी बीज किस्मों का पंजीकरण करा सकेंगे. जो किसान अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए, गांव में वितरण के लिए या किसी कंपनी के लिए बीज तैयार करता है, उसे इन प्रावधानों के तहत डिजिटल पंजीकरण कराना आवश्यक नहीं होगा.

ट्रेसबिलिटी को अनिवार्य बनाया जाएगा

सरकार का ये भी तर्क है कि वर्तमान में प्रभावी ट्रेसबिलिटी व्यवस्था न होने के कारण जब बीज फेल हो जाते हैं तो जिम्मेदारी तय करना मुश्किल होता है. नए कानून में ट्रेसबिलिटी को अनिवार्य बनाया जाएगा और जिम्मेदारी तय करने के लिए एक व्यवस्थित प्रणाली स्थापित की जाएगी.

प्रस्तावित कानून के तहत राज्य सरकारों को राज्य स्तरीय समितियों की सिफारिश पर नई बीज किस्मों को जारी करने का अधिकार दिया जाएगा। हालांकि, राष्ट्रीय मानक लागू रहेंगे. इससे राज्यों को अपनी स्थानीय जलवायु और क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप उपयुक्त बीज किस्मों को अधिक तेजी से जारी करने में मदद मिलेगी. सभी बीज किस्मों को एक एकीकृत राष्ट्रीय ऑनलाइन रजिस्टर में दर्ज किया जाएगा. ये रजिस्टर केंद्र और राज्य दोनों के लिए उपलब्ध होगा, जिससे पंजीकरण में दोहराव से बचा जा सकेगा.

सीड सिक्योरिटी फंड की स्थापना

किसानों की मांगों को ध्यान में रखते हुए प्रस्तावित कानून में प्रत्येक राज्य में सीड सिक्योरिटी फंड (बीज सुरक्षा कोष) स्थापित करने का प्रावधान किया गया है. इस फंड का प्रबंधन संबंधित राज्य सरकार करेगी. बीज अधिनियम के तहत वसूले गए जुर्माने और अन्य रिकवरी की राशि इन फंडों में जमा की जाएगी. यदि बीज फेल होने के कारण किसी किसान को नुकसान होता है, तो एक सत्यापन समिति मामले की जांच करेगी और किसान को 15 दिनों के भीतर मुआवजा उपलब्ध कराने की व्यवस्था होगी.

बिल लाने के पीछे केंद्र सरकार का ये भी तर्क है कि मौजूदा बीज अधिनियम वर्ष 1966 में बनाया गया था, जबकि बीज नियंत्रण आदेश 1983 में लागू हुआ था. ऐसे में मौजूदा कानूनी व्यवस्था नकली एवं घटिया गुणवत्ता वाले बीजों के बाजार में प्रवेश और उनकी जिम्मेदारी तय करने में मौजूद कमियों जैसी नई चुनौतियों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है.

फिलहाल, इस बिल को लाने से पहले हितधारकों और किसानों के साथ परामर्श प्रक्रिया जारी है. सरकार ने पिछले साल नवंबर-दिसंबर में प्रस्तावित बीज अधिनियम के मसौदे पर सुझाव मांगे थे. अब तक किसानों और किसान संगठनों से लगभग 18,000 सुझाव प्राप्त हुए. अब एक बार फिर उन संगठनों से प्रत्यक्ष सुझाव लेने के लिए परामर्श प्रक्रिया दोबारा शुरू की गई है, जो जमीनी स्तर पर किसानों के साथ काम करते हैं. इस सिलसिले में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह ने 10 सितंबर को देश के 20 किसान संगठनों के साथ बैठक कर परामर्श लिया. केंद्र सरकार के सूत्रों के मुताबिक सीड बिल संसद के शीतकालीन सत्र में लाया जाएगा. जिससे देश में नकली बीज और कीटनाशक के विक्रय और प्रसार पर रोक लगाया जा सके.

विशेष सत्र बुलाने का विकल्प खुला

संसद का विशेष सत्र बुलाने का विकल्प खुला रहेगा. सरकार ने संसद के विशेष सत्र को बुलाने के लिए विकल्प अभी खुला रखा है. संसद के मॉनसून सत्र का अभी तक सत्रावसान नहीं किया गया है. संसद के विशेष सत्र बुलाने को लेकर ब्रिक्स समिट के बाद सरकार फैसला लेगी. ब्रिक्स समिट के बाद सरकार ये तय करेगी कि महिला आरक्षण और परिसीमन बिल को पारित कराने के लिए विशेष सत्र बुलाना है या नहीं. अगर सरकार तय करती है की विशेष सत्र नहीं बुलाना है तो मॉनसून सत्र का सत्रावसान किया जाएगा. पर अगर सरकार विशेष सत्र बुलाने का फैसला करती है तो देवी आराधना और नारीशक्ति के सम्मान के प्रतीक नवरात्रि के दौरान सत्र बुलाने का भी विकल्प हो सकता है.

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