अनावश्यक सोच से मन में बन जाती है सामने वाले की गलत तस्वीर
राजनांदगांव (दैनिक पहुना)। खरतरगच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य श्रेयांशप्रभ सागर जी ने कहा कि गलतफहमी के कारण हम अपनों को खो देते हैं। गलतफहमी मन में द्वेष पैदा करती है और साधना के मार्ग में भी बाधा बनती है। इसलिए बेहतर है कि गलतफहमी को मन से निकालकर सामने वाले से संवाद कर उसे दूर किया जाए।जैन बगीचा स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय भवन में नियमित चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला के दौरान श्रेयांशप्रभ सागर जी ने कहा कि अधिकांश गलतफहमियां हमारी सोच और सुनी-सुनाई बातों से पैदा होती हैं। बिना तथ्य जाने और उसकी सत्यता जांचे हम निष्कर्ष निकाल लेते हैं। अनावश्यक कल्पनाओं के कारण मन में सामने वाले की गलत तस्वीर बन जाती है।
उन्होंने कहा कि हमारे व्यवहार का प्रभाव हमारे मन पर पड़ता है। हम सामने वाले के प्रति जल्दी ही धारणा बना लेते हैं और कई बार किसी तीसरे व्यक्ति के व्यवहार को देखकर भी किसी अन्य के बारे में विचार करने लगते हैं। यहीं से गलतफहमी जन्म लेती है। गलतफहमी होने पर मन में हलचल बनी रहती है। श्रेयांशप्रभ सागर जी ने कहा कि गलतफहमी का समाधान बातचीत से ही संभव है। अपनी गलती होने पर क्षमा मांगने में संकोच नहीं करना चाहिए। गलतफहमी दूर होने से मन निर्मल होता है, जबकि उसे मन में बनाए रखने से व्यक्ति जीवनभर मानसिक बोझ ढोता रहता है। उन्होंने कहा कि विचारों को विराम दें और दूसरों के बारे में अनावश्यक सोचने से बचें। सामने वाले के बारे में सोचते-सोचते हम स्वयं को भी खो देते हैं और अपने प्रियजनों को भी। मन के कषाय दूर किए बिना जीवन में आगे बढ़ना संभव नहीं है।

