बिलासपुर। हाई कोर्ट ने सूचना का अधिकार अधिनियम से संबंधित एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया है। न्यायालय ने कहा है कि आरटीआई के तहत जानकारी देने में देरी होने पर लोक सूचना अधिकारी पर जुर्माना लगाना स्वचालित या अनिवार्य नहीं है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने महासमुंद के आवेदक की याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने राज्य सूचना आयोग द्वारा दोषी अधिकारियों पर जुर्माना न लगाने के फैसले को चुनौती दी थी।
कोर्ट ने माना कि आरटीआई कानून का प्राथमिक उद्देश्य ””सूचना दिलाना”” है, न कि अधिकारियों को दंडित करना। मामला महासमुंद जिले के वरिष्ठ नागरिक ललित चंद्रनाहू से जुड़ा है, जिन्होंने 12 अप्रैल 2018 को सहकारिता विभाग के तत्कालीन संयुक्त रजिस्ट्रार के समक्ष आरटीआई आवेदन दिया था। उन्होंने 2014 से 2017 के बीच ””उर्वरक विकास कोष”” के भुगतान से संबंधित दस्तावेज मांगे थे।
अधिकारियों ने गलत जानकारी प्रदान की, जिसके खिलाफ की गई प्रथम अपील खारिज हो गई। इसके बाद याचिकाकर्ता ने छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील दायर की, जिसे आयोग ने स्वीकार कर लिया और अधिकारियों को 30 दिनों के भीतर जानकारी उपलब्ध कराने का आदेश दिया।
हालांकि, याचिकाकर्ता संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि यदि अधिकारी समय पर जानकारी नहीं देते हैं, तो उन पर जुर्माना लगाना अनिवार्य है। लेकिन सूचना आयोग के अधिवक्ता ने इसका विरोध करते हुए कहा कि जुर्माना केवल तब लगाया जाता है जब अधिकारी ने ””दुर्भावना”” से जानकारी रोकी हो।
अंततः, हाई कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि आयोग ने पहले ही जानकारी देने का आदेश दिया था, जिससे कानून का मूल उद्देश्य पूरा हो चुका है।


