जैन मुनि ने कहा- सोच-समझकर करें शब्दों का उपयोग, बात हवा में मिलकर आग की तरह फैल सकती है
राजनांदगांव(दैनिक पहुना)। खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य मुनि श्रेयांशप्रभ सागर जी ने कहा कि जंगल में बांसों के आपस में टकराने से चिंगारी पैदा होती है और हवा के संपर्क में आते ही यही चिंगारी दावानल का रूप लेकर चारों ओर फैल जाती है। इसी प्रकार हमारी कही हुई एक बात भी हवा में मिलकर आग की तरह फैल सकती है। इसलिए मनुष्य को हमेशा सोच-समझकर और मर्यादित शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
जैन बगीचा स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय भवन में चल रही नियमित चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला में मुनि श्री ने कहा कि हम भगवान महावीर तो नहीं बन सकते, लेकिन उनके बताए कुछ नियमों और सिद्धांतों को अपने जीवन में जरूर अपना सकते हैं। उन्होंने अभिभावकों को बच्चों के पालन-पोषण को लेकर महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा कि बच्चों को हर परिस्थिति में केवल ‘एडजस्ट’ करना नहीं सिखाना चाहिए, बल्कि उन्हें परिस्थितियों से निपटने का सही तरीका सिखाना चाहिए। मुनि श्री श्रेयांशप्रभ जी ने कहा कि दूसरों पर हिंसा करना ही हिंसा नहीं है, बल्कि स्वयं के प्रति हिंसक व्यवहार करना भी हिंसा का ही रूप है। बच्चों को समझना और दूसरों को समझाना सिखाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जीवन में कई अवसरों पर चुप रहना आवश्यक होता है, लेकिन कब चुप रहना है और कब अपनी बात रखनी है, इसका विवेक भी व्यक्ति को होना चाहिए।
उन्होंने अभिभावकों से कहा कि बच्चों को केवल सुविधाएं देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह भी सिखाएं कि कब, कहां और क्या करना चाहिए। सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता ही उन्हें जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम बनाएगी। प्रवचन के दौरान मुनि श्री ने शब्दों की शक्ति, आत्मसंयम, व्यवहार और बच्चों के संस्कारों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि अच्छे संस्कार और सही दिशा बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण की मजबूत नींव होते हैं।

