बीमा एजेंट के जरिए ली गई हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी (Health insurance Policy) में जानकारी छिपाने का आरोप लगाकर क्लेम खारिज करना स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस कंपनी को भारी पड़ गया। पश्चिमी जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने 24 अगस्त को कंपनी की दलीलों को खारिज करते हुए उपभोक्ता के पक्ष में फैसला सुनाया। आयोग ने मामले में बीमा कंपनी की ओर से क्लेम खारिज करने के आधार पर सवाल उठाए और उपभोक्ता के हक में निर्णय दिया। आयोग के इस फैसले से बीमा पॉलिसी लेने वाले उन उपभोक्ताओं को भी राहत मिल सकती है, जिनके क्लेम को एजेंट के जरिए पॉलिसीलेते समय जानकारी छिपाने के आरोप में खारिज कर दिया जाता है।
एजेंट की गलती के लिए ग्राहक जिम्मेदार नहीं
पश्चिमी जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग की अध्यक्ष सोनिका महरोत्रा, सदस्य ऋचा जिंदल और अनिल कुमार कौशल की बेंच ने अहम टिप्पणी की है। आयोग ने स्पष्ट कहा कि बीमा एजेंट की लापरवाही, धोखाधड़ी या किसी भी तरह की गलती का खामियाजा ग्राहक को नहीं भुगतना चाहिए। आयोग के मुताबिक, अगर ग्राहक ने एजेंट को अपनी पुरानी बीमारी से जुड़े सही तथ्य और जरूरी दस्तावेज उपलब्ध करा दिए थे, तो बीमा फॉर्म में उन जानकारियों को दर्ज नहीं करने की जिम्मेदारी बीमा कंपनी की होगी। ऐसे मामले में ग्राहक पर जानकारी छिपाने का आरोप लगाकर क्लेम खारिज नहीं किया जा सकता। आयोग ने बीमा कंपनी को उपभोक्ता को 20 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। यह राशि छह फीसदी सालाना ब्याज के साथ चुकानी होगी। इसके अलावा कंपनी को उपभोक्ता के कानूनी खर्च के तौर पर 35 हजार रुपये भी देने होंगे।
क्या है मामला
यह मामला सुभाष नगर निवासी वरिंदर कुमार भसीन की शिकायत से जुड़ा है। भसीन ने बीमा कंपनी के अधिकृत एजेंट गौरव मलिक के जरिए 10 लाख रुपये की ‘स्टार कॉम्प्रिहेंसिव इंश्योरेंस’ पॉलिसी ली थी। नो-क्लेम बोनस को शामिल करने पर पॉलिसी की कवरेज 20 लाख रुपये हो गई थी। पॉलिसी लेते समय भसीन ने एजेंट को स्पष्ट रूप से बताया था कि उनकी पत्नी सीमा भसीन का वर्ष 2014 में कैंसर का ऑपरेशन हो चुका है। उन्होंने यह भी बताया कि वह खुद शुगर के मरीज हैं। भसीन के मुताबिक, उन्होंने संबंधित मेडिकल रिपोर्ट भी एजेंट को उपलब्ध कराई थीं।
सादे फॉर्म पर करा लिए हस्ताक्षर
शिकायत के अनुसार, एजेंट ने यह कहकर भसीन से सादे फॉर्म पर हस्ताक्षर करा लिए कि वह बाद में कार्यालय जाकर उसमें जरूरी विवरण भर देगा। जब पॉलिसी की कॉपी उनके घर पहुंची तो उसमें पुरानी बीमारी वाले कॉलम में ‘नो-पीईडी’ यानी कोई पुरानी बीमारी नहीं दर्ज थी। भसीन ने इसके बाद मामले को नजरअंदाज नहीं किया। उन्होंने अगस्त 2018 में एजेंट को ई-मेल और वॉट्सऐप के जरिए अपनी पत्नी की पुरानी कैंसर संबंधी मेडिकल रिपोर्ट भेजी और पॉलिसी के रिकॉर्ड में सुधार करने को कहा। भसीन के मुताबिक, एजेंट ने उन्हें भरोसा दिलाया कि जरूरी दस्तावेज सिस्टम में अपडेट कर दिए गए हैं। इसके बावजूद बाद में क्लेम को लेकर विवाद खड़ा हो गया और बीमा कंपनी ने बीमारी से जुड़ी जानकारी छिपाने का आधार बनाकर क्लेम पर आपत्ति जताई।
बीमा दावा खारिज करना पड़ा महंगा
मई 2021 में वरिंदर कुमार भसीन की पत्नी सीमा भसीन को दोबारा कैंसर हुआ। 31 मई को मुंबई के एक अस्पताल में उनका ऑपरेशन किया गया। इलाज के दौरान 4 सितंबर 2021 को उनका निधन हो गया। पत्नी के इलाज पर भसीन ने करीब 58.37 लाख रुपये खर्च किए। इसके बाद उन्होंने बीमा पॉलिसी के तहत 20 लाख रुपये के क्लेम के लिए आवेदन किया। हालांकि, बीमा कंपनी ने 5 अक्टूबर 2021 को उनका दावा खारिज कर दिया। कंपनी ने क्लेम रिजेक्ट करने के पीछे तर्क दिया कि पॉलिसी लेते समय सीमा की पुरानी कैंसर की बीमारी से जुड़ी जानकारी छिपाई गई थी। भसीन ने कंपनी की इस दलील का विरोध किया और कहा कि पॉलिसी लेते समय उन्होंने एजेंट को पत्नी की पुरानी बीमारी और उससे जुड़े दस्तावेज पहले ही सौंप दिए थे।

