दिल्ली के जंतर-मंतर (Jantar-Mantar) पर छात्रों के ‘संसद चलो’ प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा में घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिवारों ने अब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का रुख किया है। याचिका में मांग की गई है कि ड्यूटी के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने में जुटे पुलिसकर्मियों को भी आम नागरिकों की तरह जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का प्रभावी संरक्षण सुनिश्चित किया जाए। परिवारों ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि केंद्र और संबंधित प्राधिकरणों को ऐसे दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, जिनसे ड्यूटी के दौरान पुलिसकर्मियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और अधिकारों की बेहतर रक्षा सुनिश्चित हो सके। याचिका में यह भी कहा गया है कि कानून लागू करने वाले कर्मियों को हिंसक परिस्थितियों में पर्याप्त कानूनी और संस्थागत संरक्षण मिलना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान कई पुलिसकर्मी हिंसा, पथराव और धक्का-मुक्की का शिकार हुए, जिससे उन्हें गंभीर शारीरिक और मानसिक नुकसान पहुंचा। उनका तर्क है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए जोखिमपूर्ण परिस्थितियों में काम करने वाले पुलिसकर्मियों की सुरक्षा को लेकर स्पष्ट और प्रभावी व्यवस्था होना आवश्यक है।
यह याचिका घायल एएसपी कैलाश सिंह बिष्ट, एएसआई संदीप, कॉन्स्टेबल धीरज और एएसआई हेमेन्दर राठी के परिवार के सदस्यों लक्ष्य सिंह बिष्ट, कुंजल, निशा यादव और अक्षत राठी ने संयुक्त रूप से दायर की है। याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात पुलिसकर्मी भी हिंसा और हमलों का सामना करते हैं, इसलिए उनके अधिकारों और सुरक्षा पर भी विचार किया जाना चाहिए।याचिका में क्या बताया गया?
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, हिंसा की घटनाएं केवल 20 जुलाई तक सीमित नहीं रहीं। 24 और 25 जुलाई को भी प्रदर्शन के दौरान भीड़ द्वारा पथराव किए जाने और नुकीली टाइलों सहित अन्य वस्तुओं से हमला किए जाने का आरोप लगाया गया है। इन घटनाओं में कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी गंभीर चोटें आईं। याचिका में कहा गया है कि पूरे आंदोलन के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों की संख्या लगभग 200 तक पहुंच गई। परिवारों का तर्क है कि ड्यूटी के दौरान जान जोखिम में डालकर कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाले पुलिसकर्मियों की सुरक्षा और उनके मौलिक अधिकारों को लेकर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
याचिका में कहा गया है कि संविधान का अनुच्छेद 21, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है, केवल आम नागरिकों तक सीमित नहीं है बल्कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात पुलिसकर्मियों पर भी समान रूप से लागू होता है। इसी तरह अनुच्छेद 14, जो कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, पुलिसकर्मियों को भी समान संरक्षण प्रदान करता है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है और इसके साथ कानूनी सीमाएं भी जुड़ी हुई हैं। याचिका के अनुसार, किसी भी प्रदर्शन या विरोध के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, सुरक्षा बैरिकेड्स तोड़ने या ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों एवं अन्य लोक सेवकों पर हमला करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
राष्ट्रीय दिशानिर्देश बनाने की मांग
याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि उन्हें इस मामले की मुख्य याचिका में पक्षकार (इंटरवीनर/पार्टी) के रूप में शामिल किया जाए। उनका तर्क है कि इससे अदालत के समक्ष केवल प्रदर्शनकारियों का नहीं, बल्कि हिंसा में घायल हुए पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों का मानवीय पक्ष भी रखा जा सकेगा। याचिकाकर्ताओं ने यह भी मांग की है कि अदालत ऐसे मामलों में पुलिस बल के खिलाफ हिंसा भड़काने, हमलों को उकसाने या कानून-व्यवस्था को प्रभावित करने वाले लोगों की जवाबदेही तय करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके नाम पर ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों पर हिंसा को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से देशभर में लागू किए जा सकने वाले राष्ट्रीय दिशानिर्देश बनाने की भी मांग की गई है, ताकि विरोध-प्रदर्शनों, रैलियों और भीड़ नियंत्रण के दौरान ऑन-ड्यूटी पुलिसकर्मियों और अन्य सार्वजनिक सेवकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

