अदालतों में सालों तक चलने वाले केस कई बार व्यक्ति की सब्र का इम्तेहान ले लेते है. कई बार फैसले आने तक तो अपीलकर्ता की मृत्यु तक हो जाती है. बॉलीवुड की सुपरहिट मूवी ‘दामिनी’ में इसी कारण सनी देओल का डायलॉग फेमस हुआ था ‘तारीख पर तारीख’. यह केवल डायलॉग नहीं था बल्कि देश की न्याय व्यवस्था का स्याह सच उजागर करने वाला वाक्य था. लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने दशकों से चली आ रही इस भेड़ चाल पर रोक लगाने का फैसला कर लिया है. देश की शीर्ष अदालत ने लंबित मामलों और फैसलों में होने वाली देरी पर चिंता जताते हुए सभी हाईकोर्ट के लिए अनिवार्य दिशा-निर्देश जारी किए हैं. शीर्ष अदालत ने आरक्षित फैसलों, जमानत आदेशों और उनके कारणों को सार्वजनिक करने के लिए स्पष्ट समयसीमा तय कर दी है.
अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाना होगा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि किसी भी मामले में फैसला सुरक्षित (Reserved Judgment) रखे जाने के बाद उसे अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाया जाना चाहिए. वहीं जमानत से जुड़े मामलों में आदेश आदर्श रूप से अगले दिन जारी किया जाए और उसी दिन जेल प्रशासन तक पहुंचाया जाए.
जमानत पाए कैदियों कि रिहाई उसी दिन हो सुनिश्चित
अदालत ने यह भी कहा कि जिन अंडरट्रायल कैदियों को जमानत मिल चुकी है, उनकी रिहाई उसी दिन या अधिकतम अगले दिन सुनिश्चित की जानी चाहिए. नए दिशानिर्देशों के अनुसार, अदालत पहले आदेश का प्रभावी हिस्सा (Operative Part) खुले कोर्ट में सुनाएगी और उसके विस्तृत कारण सात दिनों के भीतर वेबसाइट पर अपलोड किए जाएंगे. साथ ही, जिस दिन फैसला सुरक्षित रखा गया हो, उसकी जानकारी भी संबंधित हाईकोर्ट की वेबसाइट पर प्रदर्शित की जाएगी.
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित समयसीमा का पालन नहीं किया जाता है तो मामला किसी अन्य पीठ को सौंपा जा सकता है. वहीं, यदि फैसले के कारण 30 दिनों के भीतर अपलोड नहीं किए जाते हैं तो मामला वापस लेकर नई पीठ के समक्ष भेजा जा सकता है. शीर्ष अदालत ने सभी हाईकोर्टों के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि वे इन दिशानिर्देशों को संबंधित मुख्य न्यायाधीशों के समक्ष प्रस्तुत करें, ताकि उनका प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सके.


